“आनन्द ” फ़िल्म को मैं जब भी देखता हूँ , खुद को दूर कहीं दूर किसी स्रोतस्विनी की जलधारा के साथ प्रवाहित होता पाता हूँ , अनजान किनारों के बीच ! ” आनन्द मरा नहीं , आनन्द मरा नहीं करते। ” यह वाक्य जैसे चारों ओर प्रतिध्वनित होता रहता है। कितना दुःख , दर्द और वेदना है संसार में। यदि आनन्द न रहा तो अधरों पर मुस्कराहट कैसे जन्म लेगी , आँखों में चमक कैसे उत्पन्न होगी ? कौन जाने आनन्द प्राप्ति की उत्कंठा ही जीवंतता की धुरी हो।

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