झकझोरती दस्तक

  वो रोज़ दबे पाँव दस्तक देता है , मुस्कराता है और चला जाता है ! बुलाता है मेरे माज़ी को हौले से , बुदबुदाकर वो कहीं खो जाता है ! ढूँढ़ता रहता हूँ उसे बेचैनियों में , अंतस को चीरती थकी साँसों में ! ठहरे हुए कुछ क्लांत से पलों में , या फिर … Continue reading झकझोरती दस्तक

जनआकांक्षाओं की जनक्रांति

देश के सबसे बड़े राज्य के चुनाव परिणामों ने एक बार फिर जनआकांक्षाओं की जनक्रांति का उद्घोष किया है। इन चुनाव परिणामों को किसी दल विशेष की मात्र जीत के रूप में देखना इसका सतही आंकलन होगा और कदाचित इस जनआंदोलन को नकारने जैसा ही होगा और फिर से अतीत में भी जनता द्वारा की … Continue reading जनआकांक्षाओं की जनक्रांति

Thought

राजनीति प्रतिबद्धताओं का नहीं जागरूक विश्लेषण का विषय है , ऐसी मेरी मान्यता है। जिस देश के नागरिक जागरूक होते हैं उस देश को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। लोकतंत्र में सरकारें जनमानस को प्रतिबिंबित भी करती हैं और उनका प्रतिनिधित्व भी करती हैं , परन्तु इन सरकारों को जबाबदेह जनता ही बना … Continue reading Thought

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यह संसार बड़ा विचित्र है। अपना दुःख बाँटने जो निकलता है उसे बहुधा निराशा ही मिलती है क्योंकि जो दिखता है बहुधा वह प्रवंचना ही होती है। मनुष्य अपने दुःखों पर अपनी संकल्पशक्ति तथा जिजीविषा से ही विजय प्राप्त कर पाता है। इसलिए अपने दुःखों को यथासम्भव अपने अंतस में सँजोकर रखना भी एक जीवन … Continue reading Thought

ये बेज़ार सा शहर . . . .

विलुलित नेत्रों से देखता हूँ एक बेज़ार सा शहर , इसकी दूर तक जाती घुमावदार कोलतार सड़कें , बड़े-बड़े चौराहे और उनके इर्द-गिर्द दौड़ती ढेरों गाड़ियाँ , आलीशान बाज़ारों की चकाचौंध और मॉल की रंगीनियाँ , बार में रंगत बिखेरती नए मिज़ाज की रानाइयाँ , अलसाई सुबह और सजती-सँवरती रात की बेबाकियाँ , बहुमंजिली इमारतों … Continue reading ये बेज़ार सा शहर . . . .

Thought

ये कंटीली पगडंडियाँ , ये पथरीले रास्ते , ये आँधियों के थपेड़े और समय के कर्कश प्रहार ! सब निर्जीव हो जाते हैं जब कोई इन दुर्गमताओं में हमसफर हो जाता है !