बेचैन अँधियारा :

सियहरात का ये बेचैन अँधियारा , धुँधलके में घिरा हुआ , या किसी शापित अंधे कुएँ के , निष्प्राण तल से झाँकता हुआ , किसी लैम्पोस्ट की रोशनी से , जन्म लेती प्रभामणियों को , किसी मैले आँचल से ढँकता हुआ , दिनभर की उड़ान से थके हुए पक्षियों को , किसी वृक्ष की टहनियों … Continue reading बेचैन अँधियारा :

बदनसीबी :

आज वो फिर किसी फुटपाथ पे सोया है , सबके नसीब में घर की छत नहीं होती ! वो अपने घुटनों को मोड़ सिकुड़कर सोया है , सबके नसीब में ओढ़ने को चादर नहीं होती ! वो तो रातभर तन्हाई में करवट बदलता है , सबके नसीब में काँधे की सिहरन नहीं होती ! उसको … Continue reading बदनसीबी :

केवल देह नहीं हो तुम :

पथिक ! तनिक ध्यान से देखो , तुम्हारे अन्तस में पलते हैं , अगणित आशा-पुंज , उनकी तान-धुन पर तैरती , ज्योतिर्मय तीव्र लहरियाँ , उनसे संगत करते , जीवंतता के सशक्त स्वर , अनन्त को मुट्ठी में भर लेने का , अनुपमेय निश्छल आवेग , खग-पंखों पर उड़ान भरती , न जाने कितनी उम्मीदें … Continue reading केवल देह नहीं हो तुम :

यथार्थ से प्रश्न :

शाश्वत सत्य को अंगीकार करती , एक युगपुरुष की थकीहारी देह का , कालचक्र में हो गया अवसान , धधकती अग्नि की क्रूर लपटों ने , उसे कर दिया पंच-तत्वों में विलीन ! कालखण्ड बने दृश्य की साक्षी थीं , सैलाब सी उमड़ी अगणित आँखें , कुछ अश्रुपूर्ण तो कुछ बेचैन सी , कुछ स्तब्ध … Continue reading यथार्थ से प्रश्न :

कचोटता यथार्थ :

कल वो सोया तो बहुत देर तक सोता रहा , ओढ़कर बिखरे ख़्वाबों की मटमैली चादर ! अब उसे यक़ीन हुआ कि वो थक गया था, जीवन के प्रवंचनामयी छलावों में दौड़कर ! उस बड़े से मकान के एक तन्हा कमरे में , नींद में भी वो जाने क्यों छटपटाता रहा ! न जाने कौन … Continue reading कचोटता यथार्थ :

अनुत्तरित प्रश्न :

देखता हूँ कोलतार पथों से सुसज्जित , बहुमंजिली इमारतों के साये में , प्राणवान धड़कनों सा धड़कता , अपनी आभा चहुँओर बिखेरता , अपनी चमक-दमक से इठलाता , किसी नवयौवना की तरह सजता-सँवरता , पौराणिक कलाकृतियों को ललकारता , नई सांस्कृतिक धरोहर की दुंदुभी बजाता , एक बड़े भूखण्ड पर अस्तित्व बोध कराता , उत्तराधुनिक … Continue reading अनुत्तरित प्रश्न :

वो फिर मेरे घर आया था :

बरसों बाद  आज  वो फिर मेरे घर आया था , मुझको मेरी भूली हुई पहचान देने आया था ! जो कभी हर तरह  महफूज़ था मेरे साये में , मुझसे मेरे मकान का पता पूछके आया था ! यूँ बेवजह आने का तो कोई सबब नहीं होता , वो अपनी फिर नई फरियाद लेके आया … Continue reading वो फिर मेरे घर आया था :

अंतहीन यात्रा :

रोज़ देखता हूँ तन्हा चाँद को , नीरवता भरे सन्नाटे में , अपनी धवल दीप्ति से बेखबर , नभ में टँगे तारागणों के बीच , किसी आकाशगंगा के किनारे , अपनी छोटी सी पेशानी पर , जन्मों की अतृप्ति की सिलवटें सँजोये , वितृष्णा की गाथा का , न जाने कौनसा अध्याय लिखते , एक … Continue reading अंतहीन यात्रा :

एक जीवन-सत्य :

पथिक ! अपना द्रष्टव्य स्थिर करके , फेन उगलती , लरजती , गरजती , सागर की मदमत्त लहरों को देखो ! जो न जाने किस स्पृहा के वशीभूत , अनन्त काल से करती हैं किनारों पर , निर्ममता से भीषण प्रहार ! पर नहीं छोड़ता किनारा अपनी मर्यादा , नहीं ग्रसित होता किसी वैमनस्य से … Continue reading एक जीवन-सत्य :

मुसाफ़िर :

धीरे-धीरे  बीत रहा था वो पलों  की तरह , बह रहा था हवाओं में वो झोंकों की तरह ! न चाँदनी की कशिश थी न उषा की ललक , इन्हें वो लाँघ आया था मुसाफ़िर की तरह ! ज़मीन अजनबी थी  और फ़लक बहुत दूर , वो बह रहा था समन्दर में लहरों की तरह … Continue reading मुसाफ़िर :