जाने कितने पैमानों से ज़हर पिया होगा , तब कहीं जाके वो मुक़द्दस बना होगा ! जाने कितने इम्तिहानों से गुज़रा होगा , तब कहीं जाके वो मुअल्लिफ़ बना होगा ! जाने कितनी रुसवाइयों से जूझा होगा , तब कहीं जाके वो मुअस्सिर बना होगा ! जाने कितनी ख़्वाहिशों को दफ़नाया होगा , तब कहीं … Continue reading रहनुमा :
आसमान सोया है :
हे चहुँओर पसरी मदमत्त चाँदनी ! इस कदर मत इठलाओ , अरी लरजती लहरो ! इतनी गर्जना मत करो , ओ कल-कल करती नदियो ! अपने छपाकों को शांत कर लो , हे निशा से अठखेलियाँ करते राकापति ! अपनी इस प्रणय-लीला को रोक लो , अरे अँधेरों को लजाते जुगनुओ ! कुछ देर कहीं … Continue reading आसमान सोया है :
नया आलोक :
अब वो माज़ी की सदाओं में नहीं जीता , उसने रुतों की तरह जीना सीख लिया है ! अब वो उन लाचारियों में नहीं रहता , उसने हालात से लड़ना सीख लिया है ! घने तिमिर के तिलिस्म से निकलकर , उसने उजालों में हँसना सीख लिया है ! माथे पे मढ़ी मलिन स्याही को … Continue reading नया आलोक :
विषमतायें :
ये बादल तो आवारा है ये भला क्या जाने , उस बदनसीब की छत से पानी टपकता है ! ये आँधियाँ तो बेख़ौफ हैं ये भला क्या जानें , उस झोंपड़ी का छप्पर अब भी कंपकपाता है ! ये आशियाँ तो मदहोश है ये भला क्या जाने , वहाँ दो जून की रोटी को बचपन … Continue reading विषमतायें :
कलयुग का अजेय रावण :
देश में धूम थी दशहरा-पर्व की , असंख्य रावण के पुतले , राजनेताओं के तीर खाकर , आग की भयंकर लपटों में , जल रहे थे धूँ-धूँ कर ! राजनेताओं की आढ़ में , सहमे से थे अभिनेता राम , लेकिन रावण कर रहा था , गगनभेदी क्रूर अट्टहास ! खुद ही सुना रहा था … Continue reading कलयुग का अजेय रावण :
प्रलयंकारी उत्सर्जन :
पथिक ! ज़रा ग़ौर से देखो , निःशब्द , निस्तेज किन्तु पाषाणी , विशाल चट्टानों को चीरकर , इनके अन्तस् की तरलता , नियति के निरंतर भयंकर दबाब , उपेक्षा के स्फोटक आवेग , और पर्त-दर-पर्त दबी हुई , प्रतिशोध की धधकती ज्वाला लिए , उस ज्वालामुखी के मुख से , लावा के रूप में … Continue reading प्रलयंकारी उत्सर्जन :
हक़ीक़त :
उनकी महफ़िल में सवेरा नहीं होता , अँधेरों में आदतन उजाला नहीं होता ! झूठ और फ़रेब में अक्सर जीते-जीते , सच्चाई से जीने का हौसला नहीं होता। वतनपरस्ती में जीने को वो क्या जानें , वतनफ़रोशी से जिन्हें गुरेज़ नहीं होता। अपने ही आशियाने को जला देते हैं वो , वतन के लिए जिनमें … Continue reading हक़ीक़त :
प्रवाह :
मैं तो बस केवल प्रवाह , किसी दरिया का , किसी नहर का , किसी लघु सरिता का , किसी स्रोतस्विनी का , किसी जल-प्रपात का , किसी मचलती जल-धारा का , या लरजती-गरजती लहरों का ! मेरा जीवन ही जीवंतता , मेरा उद्दीपन ही जिजीविषा , मेरा आकर्षण ही निरंतरता , मेरा ध्येय ही … Continue reading प्रवाह :
मेघा रे :
मेघ ! कितने रूपों में तुम , बँटे कितने खानों में तुम , किसी प्रेमी का दूत बनकर , प्रेयसी का मनुहार बनकर ! सुकुमार की उमंग बनकर , बचपन की मस्ती बनकर , यौवन का प्रमाद बनकर , मतवाले की उड़ान बनकर ! बिरहन की तपन बनकर , तड़प की प्यास बनकर , प्यास … Continue reading मेघा रे :
क़शिश :
ये बादल यूँ ही मेरी छत से गुज़र जाते हैं , गोया इन्होंने भी बेबफाई की क़सम खाई है ! जाने फिर भी क्यों आसमाँ को देखता हूँ मैं , कौनसे ज़ख्म ने उभरने की क़सम खाई है ! वक़्त तो तन्हाइयों में यूँ ही गुज़र जाता है , किस आरज़ू ने मचलने की क़सम … Continue reading क़शिश :