दीप-प्रज्वलन :

रात्रि-तिमिर में धवल चाँदनी को लजाता , व्योम के नीले-तल के देदीप्यमान रूप को सँवारता , ताराकिणी निशा के रुपहले दामन से परिहास करता , मस्तिष्क की समस्त ऊर्जा को एकचित्त करता , हवाओं की अदृश्य ऊष्मा को संग्रहीत करता , दिशाओं को अपनी लक्ष्य-चेतना से अभिज्ञ कराता , नीरवता के शून्य-जल में विकिरण उत्पादित … Continue reading दीप-प्रज्वलन :

समय से अनुनय :

समय भी बैठ गया है थककर , किसी वृक्ष की टहनी पर , कुछ कम्पित से पत्तों की चादर ओढ़ , देख रहा है विकरालता बेबस होकर , फ़ासलों की तहों में निरन्तर ! अनभिज्ञ नहीं है इस सत्य से , जब रुक जाता है प्रवाह , तो थरथरा जाती है समूची सृष्टि , कौंधने … Continue reading समय से अनुनय :

विवशता :

विलुलित नेत्रों से देखता हूँ , उस पार कराहते धुँधलके में , अंतिम संस्कार को तरसते , सड़क पर पड़े लाशों के ढेर , नई सभ्यता के अग्रगामी देश में , जहाँ रिश्तों की डोर बेदर्दी से तोड़कर , दुबक गयी है प्राणहीन आत्मीयता , बन्द दरवाज़ों के किसी सुरक्षित कोने में , अपना ही … Continue reading विवशता :

अमिट विश्वास :

मैं  बूँद-बूँद  तपिश और  बेचैनियों  की आस , मैं आँसुओं की चुभन और मिलन की सुवास ! मैं आरज़ुओं की कसक और ज़र्रा-ज़र्रा प्यास , मैं प्यार की कशिश और माज़ी की अरदास ! मैं चाहतों की ख़लिश और मंजिलों का हवास , मैं ज़ीस्त का समन्दर और लहरों का एहसास ! जी चाहे जितना  … Continue reading अमिट विश्वास :

क्या यह द्वंद्व हमारा नहीं ?

देखता हूँ अनेकानेक चेहरे , सभी में अपने ज्ञान का भ्रांत-तिलिस्म , अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाओं के भँवर , उनमें डूबा हुआ स्वनिर्मित अर्द्ध-सत्य , स्वयं को बुनता ह्रदय-तरंगों का आवेग , स्वयं को सही ठहराने का उद्रेक , श्रेष्ठता को डुबोती विध्वंसक चेष्टाएं , आत्मा की बलि देती अनगिनत आकांक्षायें , इनके वशीभूत न जाने कितने … Continue reading क्या यह द्वंद्व हमारा नहीं ?

बेख़ौफ़ हवायें :

बेख़ौफ़ हवायें ये ज़ुल्म हर रोज़ किया करती हैं , मेरे दरवाज़े को अक्सर  दस्तक दिया करती हैं ! सरसराहट सी होती है इन खिड़कियों में अक्सर , जाने कौनसी आरज़ू लिए नेज़े सी चुभा जाती हैं ! सियहरात के अँधेरों में जब बेचैनियाँ मचलती हैं , ये अपनी बेबाकियों से दुश्वारियाँ किया करती हैं … Continue reading बेख़ौफ़ हवायें :

अज़ीब दिलक़शी :

यूँ ही तन्हाई में हम दिल पे सितम करते हैं , तुझको लिखते हैं मगर  उसको मिटा देते हैं ! ये तो सच है कि ज़िन्दगी दूर चली आयी हैं , फिर  भी माज़ी को हम अब  भी सदा देते हैं ! वो हवाएं तो अब गुलशन  में नहीं आती हैं , फिर भी जज़्बातों … Continue reading अज़ीब दिलक़शी :

चेतना-शून्य आँधियाँ :

आँधियाँ अक्सर मदहोश होती हैं , उजाड़ देती हैं अनगिनत गुलशन , तोड़ देती हैं अनगिनत सपने , मिटा जाती हैं सृजन की लकीरें , बहा ले जाती हैं भविष्य की आशाएं , नहीं देखती झूठ और फ़रेब , नहीं जानतीं सत्य की सीमाएं , अनजान रहती हैं अंधी स्वार्थपरता से , बेख़बर रहती हैं … Continue reading चेतना-शून्य आँधियाँ :

विवश इतिहास :

इतिहास भी  विस्मयकारी होता , कभी  भविष्य की  नहीं  सोचता , न  कभी  वर्तमान को  विचारता , बस मूल्यांकन अतीत का करता ! गर्भ में  इसके  छिपे  कालखण्ड , जाने कितने प्रयाणों के मेरुदण्ड , प्रणेताओं की कालजयी गाथायें , उत्थान और पराभव की कथायें ! अंकित  है  इसके  अमिट पृष्ठों पर , वैश्विक संस्कृतियाँ … Continue reading विवश इतिहास :

स्वप्निल आकांक्षा :

जी चाहता है गुलशन में कलियों सा खिल जाऊँ , या यहीं कहीं फूलों की सुवास  बनके ठहर जाऊँ ! किसी पनघट पे सुकुमारता का मनुहार बन जाऊँ , या नवयौवन के सपनों का मधुर श्रृंगार बन जाऊँ ! सुरमयी अँखियों का कोई अल्हड़ सपना बन जाऊँ , या प्रेमातुर श्वासों का मनभावन संगीत बन … Continue reading स्वप्निल आकांक्षा :