ये झकझोरती बारिश 

ये बारिश हमेशा रूमानी नहीं होती , हमेशा इसमें सुकुमारता नहीं होती।। देखता हूँ छतों से रिसते पानी को , सीलन की दुर्गन्ध और बेबसी को। सीली हुई माचिस की तीलियों को , हथेली में रगड़ने की कोशिशों को।। देखता हूँ विकृत से जल-भराव को , पलायन करती बेबस जिन्दगी को। दो जून की रोटी … Continue reading ये झकझोरती बारिश 

बेचैन रात

 रात न जाने क्यों हर रोज करवटें बदलती है , ये कौन-से ख़्वाब हैं जो इसे सोने नहीं देते । कौन-सी प्रवंचनाएं पलती हैं इसकी पलकों में , बेचैनियों के कौन-से समंदर इसे सोने नहीं देते। जाने किसको वीराने में देखती है यह अपलक , आरजुओं के कौन-से धुंधलके इसे सोने नही देते। जब दर्द … Continue reading बेचैन रात

जल-प्रपात

पथिक ! तनिक ग़ौर से देखो , उस प्रवाहमान जल-प्रपात को , जिसने न जाने कितने संकल्पों से , न जाने कितनी जिजीविषा से , न जाने कितनी साधना से , और कालजयी अथक परिश्रम से , अभेद्य चट्टानों को चीर कर , बनाया है अपना मनोहारी उद् गम ! पथिक ! तुम यह भी … Continue reading जल-प्रपात

दरवाजे

पथिक ! किसकी बाट जोहते हो ? अपने पुराने निरर्थक से मकान के , निष्प्राण होते जाते दरवाजों को खोलकर , किसी ढलती हुई साँझ की तरह ! क्यों निरंतर याद करते हो , उन लौट कर न अाने वाले पलों को , जब कोई देता था दस्तक , तुम्हारे बंद दरवाजों को , तब … Continue reading दरवाजे

किनारे और जलधारा

पथिक ! कैसा अद्भुत है जीवन , किनारे देते हैं अस्तित्व जलधारा को , इन्हीं की गोद में खेलती , कूदती , मचलती , और इन्हीं से पोषित और पल्लवित होकर , पाती है जलधारा अपनी पहचान , अपने गन्तव्य की अपरिचित दिशा , अपनी जिजीविषा और संकल्प , अपना निरन्तर मनोरम प्रवाह ! पथिक … Continue reading किनारे और जलधारा

दु:स्वप्न

वो आज भी भेदता है मेरे दामन को , किसी तंज़ -भरे नुकीले नेज़े की तरह ! और कसकता है दिल की गहराइयों में , चुभ कर टूटे हुए किसी काँटे की तरह !! वो धड़कता है साँसों में बहुत हौले से , दूर से आती बोझिल हवाओं की तरह ! और दहकता है बेज़ार … Continue reading दु:स्वप्न

भोर की दस्तक

अपलक नेत्रों से देखता हूँ , सूर्य के तेजोमय रक्तवर्ण ललाट में , स्वर्णिम परिधान में सुसज्जित , किरणीली आभा से सुशोभित घूँघट में , लजाती अरुणिमा का विलक्षण समर्पण , और उनकी प्रेममय आभा से प्रस्फुटित , दिग-दिगन्त में अप्रतिम कान्ति बिखेरता , यह मनोहारी देदीप्यमान आलोक ! बिहँसते पक्षियों का कलरव , जलधाराओं … Continue reading भोर की दस्तक

फिर मैं भी तुम्हें गीत दूंगा

विलुलित नेत्रों से देखता हूँ , कोलतार पथों से सुसज्जित , बहुमंजिली इमारतों में अंगड़ाई लेते , नाना प्रकार की सुख-सुविधाओं के उद्घोषक , आलीशान भवनों की कतारों से , नई सभ्यता की दुंदुभी बजाते , महानगरों और नगरों से दूर , किसी अजन्मे प्रारब्ध की तरह , विपन्नता और अभावों की नियति में , … Continue reading फिर मैं भी तुम्हें गीत दूंगा

एक और बलात्कार

अंधकार ! गहन अंधकार !! मानवता का ! मानवीय मूल्यों का !! किसी तिलिस्मी तिमिर को भी , लज्जित और शर्मसार करती , इंसानियत को चिथड़ा-चिथड़ा करती , पैशाचिक और वीभत्स हुंकार , बीच में गूँजते बेमानी आर्त -वेदना-स्वर ! बहरा -बहरा सब कुछ , विक्षिप्त सी नीरवता में , दरिंदगी का भयावह चक्रवात , … Continue reading एक और बलात्कार

निस्तब्ध घर

ये अजीब सा शांत और बेजान घर , अपनी निस्तब्धता में कुछ कहता है ! अब यहाँ किलकारियाँ नहीं गूँजती , कोई शोरगुल अब यहाँ नहीं होता , ना ही खिलौने बिखरे दिखते हैं , ना ही किताबें फ़र्श पर इधर -उधर दिखती हैं , ना ही किसी कॉपी पर स्याही बिखरती है , ना … Continue reading निस्तब्ध घर