कचोटता यथार्थ :

कल वो सोया तो बहुत देर तक सोता रहा , ओढ़कर बिखरे ख़्वाबों की मटमैली चादर ! अब उसे यक़ीन हुआ कि वो थक गया था, जीवन के प्रवंचनामयी छलावों में दौड़कर ! उस बड़े से मकान के एक तन्हा कमरे में , नींद में भी वो जाने क्यों छटपटाता रहा ! न जाने कौन … Continue reading कचोटता यथार्थ :

एक ज्वलंत प्रश्न :

इस देश में यह कौनसी हवा बहने लगी है जहां देशभक्ति के गीतों की स्वरलहरी की जगह अब देश को अपमानित करने वाली बातों को और देश के दुश्मनों को महिमामंडित करने वालों को अभिव्यक्ति की तथाकथित स्वतंत्रता के नाम पर प्रश्रय दिया जाता है। मीडिया ऐसे विचारों को भर्त्सना के स्थान पर एक वैचारिक … Continue reading एक ज्वलंत प्रश्न :

अनुत्तरित प्रश्न :

देखता हूँ कोलतार पथों से सुसज्जित , बहुमंजिली इमारतों के साये में , प्राणवान धड़कनों सा धड़कता , अपनी आभा चहुँओर बिखेरता , अपनी चमक-दमक से इठलाता , किसी नवयौवना की तरह सजता-सँवरता , पौराणिक कलाकृतियों को ललकारता , नई सांस्कृतिक धरोहर की दुंदुभी बजाता , एक बड़े भूखण्ड पर अस्तित्व बोध कराता , उत्तराधुनिक … Continue reading अनुत्तरित प्रश्न :

यह कैसा लोकतंत्र ?

देश में विभिन्न विधानसभाओं में तथा संसद में शोरग़ुल मचाना , आरोप- प्रत्यारोप के समय सभी मर्यादाओं को भूल जाना , देश की समस्याओं के स्थान पर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने के लिए महत्वपूर्ण समय को व्यक्तिगत एवं राजनितिक महत्वाकांक्षाओं के लिए बलि चढ़ाने का प्रयास करना ,जैसी घटनाएं तो आज के राजनेताओं के लिए … Continue reading यह कैसा लोकतंत्र ?

वो फिर मेरे घर आया था :

बरसों बाद  आज  वो फिर मेरे घर आया था , मुझको मेरी भूली हुई पहचान देने आया था ! जो कभी हर तरह  महफूज़ था मेरे साये में , मुझसे मेरे मकान का पता पूछके आया था ! यूँ बेवजह आने का तो कोई सबब नहीं होता , वो अपनी फिर नई फरियाद लेके आया … Continue reading वो फिर मेरे घर आया था :

अंतहीन यात्रा :

रोज़ देखता हूँ तन्हा चाँद को , नीरवता भरे सन्नाटे में , अपनी धवल दीप्ति से बेखबर , नभ में टँगे तारागणों के बीच , किसी आकाशगंगा के किनारे , अपनी छोटी सी पेशानी पर , जन्मों की अतृप्ति की सिलवटें सँजोये , वितृष्णा की गाथा का , न जाने कौनसा अध्याय लिखते , एक … Continue reading अंतहीन यात्रा :

एक जीवन-सत्य :

पथिक ! अपना द्रष्टव्य स्थिर करके , फेन उगलती , लरजती , गरजती , सागर की मदमत्त लहरों को देखो ! जो न जाने किस स्पृहा के वशीभूत , अनन्त काल से करती हैं किनारों पर , निर्ममता से भीषण प्रहार ! पर नहीं छोड़ता किनारा अपनी मर्यादा , नहीं ग्रसित होता किसी वैमनस्य से … Continue reading एक जीवन-सत्य :

महिला-दिवस और महिला सशक्तीकरण :

कल महिला-दिवस था। अनेक स्थलों पर नारी-सम्मानार्थ कार्यक्रम आयोजित किये गए। मेधावी महिलाओं के लिए पुरस्कार-वितरण समारोह भी किये गए। ये बात और है कि इनमें से अधिकतर कार्यक्रम पुरुषों द्वारा आयोजित या प्रायोजित थे। दिनभर बधाइयों का सिलसिला चलता रहा। अनेक लेख और आलेख भी लिखे और प्रकाशित किये गए। टी.वी . चैनलों पर … Continue reading महिला-दिवस और महिला सशक्तीकरण :

मुसाफ़िर :

धीरे-धीरे  बीत रहा था वो पलों  की तरह , बह रहा था हवाओं में वो झोंकों की तरह ! न चाँदनी की कशिश थी न उषा की ललक , इन्हें वो लाँघ आया था मुसाफ़िर की तरह ! ज़मीन अजनबी थी  और फ़लक बहुत दूर , वो बह रहा था समन्दर में लहरों की तरह … Continue reading मुसाफ़िर :