बदलती हवायें :

हवाओं ने अपना रुख़ बदल लिया है , उसके दरवाजे अब वो दस्तक नहीं सुनते , जिसकी आदत थी उन्हें सुनने की , वो रंजोग़म की स्याही भी न रही , जो रोज़ लिखती थी सफ़ों पर , चाही-अनचाही न जाने कितनी बातें , न जाने कहाँ गयीं वो बेचैनियाँ , और वो दिन-रात की … Continue reading बदलती हवायें :

सोमवार की सुबह !

देखता हूँ अनमना सा अपने समीप ही , सोमवार आते ही कोलतार-पथ बुनती , उत्तराधुनिक सभ्यता में साँस लेती , ये दूर तक जाती चौड़ी-चौड़ी सड़कें , सप्ताहांत के रविवार को सुसियाने के बाद , भोर की पहली किरण के साथ ही , जो फिर से हो जाती हैं मानो जीवन्त , और इनकी जिजीविषा … Continue reading सोमवार की सुबह !

आरज़ू . . .

रुपहली साँझ को देखकर , जब नदी इठलाने लगे , हवाएं गुनगुनाने लगें , जुगनुओं की रोशनी , मुस्कराकर तिमिर को चिढ़ाने लगे , पानी के छपाकों की मंद-मंद आवाज़ , स्वर-लहरी बन स्पंदन करने लगे , पतवार का दामन थामे नौका , किनारों के स्पर्श के लिए बढ़ने लगे , किसी समंदर के दूसरे … Continue reading आरज़ू . . .

भगत सिंह मरा नहीं करते . . .

बांगा , लायलपुर की उस घनी बस्ती के , बेनूर से होते जाते पुराने मकान से , आज भी एक आवाज़ प्रतिध्वनित होती है , जो बारम्बार पुकारती है , धमनियों में बहते लहू को , गूँजती है अन्तस् की गहराइयों में , झकझोरती है मानवीय संवेदनाओं को , पूछती है न जाने कितने प्रश्न … Continue reading भगत सिंह मरा नहीं करते . . .

हर साल की बाढ़

  ये बाढ़ तो बाढ़ है हर साल आती है , चन्द दिनों के लिए मलिन से घरों को , छोड़कर जाने का बस पैगाम लाती है , वो जिनका मरना क्या और जीना क्या, जिनकी फ़िक्र करके पाना क्या और खोना क्या, ऐसे कुछ लोगों के मरने की ख़बर बन जाती है , कुछ … Continue reading हर साल की बाढ़

जुम्हूऱियत का खेल

जो कुछ वो कह रहा था बड़े एतमाद से , उसको यक़ीन था वो झूठ बोल रहा था ! पर सामने चाटुकारों का बड़ा हुजूम था , जो बस उसके जयघोष में मशग़ूल था ! लोग थे मदहोश उनमें अज़ीब जोश था , कुछ कर गुजरने का बेपनाह जुनून था ! जो थे गुनहगार वही … Continue reading जुम्हूऱियत का खेल

स्वप्न

  देखता हूँ चहुँओर बिखरे हुए असंख्य स्वप्न , कुछ मुर्झाए हुए , कुछ बेचैनियों में डूबे हुए , कुछ तड़पते हुए , कुछ यूँ ही झकझोरते हुए , कुछ अलसाये हुए , कुछ उनींदा से लगते हुए , कुछ बेकसी में कसकते हुए , कुछ बिलखते हुए , कुछ समय की त्रासदी पर अपनी … Continue reading स्वप्न

फुटपाथ

  कोलतार पथ का दामन थामे , दिनभर राहगीरों की पदचाप का , उनकी दौड़ती हुई ज़िन्दगी का , उनके बनते-बिगड़ते सपनों का , किसी जाने-बूझे गन्तव्य का , पर्याय बनता है ये फुटपाथ ! एकदम जड़वत और शान्त , फिर भी करता है प्रतिध्वनित , न जाने कितनी संवेदनाओं की , न जाने कितनी … Continue reading फुटपाथ

होली की फुहार

  फागुन की बयार उड़ाती मतवाले रंग होली के , ढोल , मृदंग संग पैजनियाँ गाती गीत होली के ! अल्हड़ युवतियाँ छेड़ें मधुरिम संगीत होली के , पिचकारियों से भीगती चूनर करें नृत्य होली के ! होठों की लालिमा गालों में भरती रंग होली के , मतवालों की चिरौरियाँ करती हुड़दंग होली के ! … Continue reading होली की फुहार

झकझोरती दस्तक

  वो रोज़ दबे पाँव दस्तक देता है , मुस्कराता है और चला जाता है ! बुलाता है मेरे माज़ी को हौले से , बुदबुदाकर वो कहीं खो जाता है ! ढूँढ़ता रहता हूँ उसे बेचैनियों में , अंतस को चीरती थकी साँसों में ! ठहरे हुए कुछ क्लांत से पलों में , या फिर … Continue reading झकझोरती दस्तक