नए परिवेश :

ज़माने में दिखावे इतने बढ़ गए , जिंदगी के फ़लसफ़े ही बदल गए , कौन है जिससे इज़हारे दिल करें , नुमाइश में जज़्बात ग़ुम हो गए !!

निःशब्द शब्द :

जब धमनियों में लहू लहरों सा लरजने लगे , जब उमंगें उत्ताल तरंगों सी मचलने लगें , जब साँसें बेख़ौफ़ आँधियों सी बहकने लगें , जब धड़कनें किसी तान-धुन पर थिरकने लगे , जब खग-स्वप्न अपने अनंत को छूने लगें, जब जन्मों की प्यास समंदर में समाने लगे, न अँधेरों का ख़ौफ हो, न उजालों … Continue reading निःशब्द शब्द :

कचोटता यथार्थ :

कल वो सोया तो बहुत देर तक सोता रहा , ओढ़कर बिखरे ख़्वाबों की मटमैली चादर ! अब उसे यक़ीन हुआ कि वो थक गया था, जीवन के प्रवंचनामयी छलावों में दौड़कर ! उस बड़े से मकान के एक तन्हा कमरे में , नींद में भी वो जाने क्यों छटपटाता रहा ! न जाने कौन … Continue reading कचोटता यथार्थ :

धुँधलका :

सुबह उठते ही देखता हूँ , सफेद धुँधलके में ख़ुद को छिपाता , किसी नीरवता में साँस लेता , ठिठुरता , सिकुड़ता ,सिहरता , ख़ुद को ख़ुद में ही कहीं ढूँढ़ता , उनींदा सा , कुछ खोया-खोया सा , कुछ अज़ीब सा द्वंद्व करता , अनमना सा ये शहर ! फिर पास ही बामुश्किल देखता … Continue reading धुँधलका :

अहसास :

मुद्दतों बाद आज दिल परीशाँ क्यों है , ज़रूर उसपे कुछ नागवार गुजरा है ! दिल की बेचैनियाँ खुद-ब-खुद कहती हैं, उसे किसी रंजोग़म का ज़ख्म मिला है ! यूँ तो कशिश सीने में दफ़न हो जाती है , धड़कने कहती हैं वो तन्हाई में रोया है ! वो जिसको भूले हुए ज़माना बीत गया … Continue reading अहसास :

दर्द :

दर्द ! तुमने मुझको दी ये कौन-सी तन्हाइयाँ , चाहतें सब ग़ुम हुई और बन गयीं रुसवाइयाँ , दौड़ते थे छूने को जो कल तक मेरी परछाइयाँ , सुनसान हुए वो रास्ते और वीरान पगडंडियाँ ! जो कभी करती थीं आँगन में मेरे अटखेलियाँ , अपनों की वो महफिलें और झूमती नजदीकियाँ , तुमने अपने … Continue reading दर्द :

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता :

पथिक ! यह देश अब स्वतन्त्र है , यहाँ कुछ भी कहने की स्वतन्त्रता है , हाँ ! किसी के लिए कुछ भी कहने की , मर्यादाओं की परिधि को तिलांजलि देकर , अपशब्दों की सीमाओं को लांघकर , मान-सम्मान जैसी निरर्थकता को भूलकर , अपनी दुंदुभी का गुणगान करते , अपने दम्भ और मदमत्तता … Continue reading अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता :

प्यासी रेत :

पथिक ! न जाने किसका शाप ढोती है , रेगिस्तान की वीरानियों में पलती रेत ! जिसकी नियति है तपना और तड़पना , जन्मों की प्यास अन्तस् में दबाये रखना , अपनी तन्हाई में ख़ुद ही जलते रहना , कभी किसी से अपनी व्यथा न कहना , तेज आँधियों के भीषण प्रहार सहना , चक्रवातों … Continue reading प्यासी रेत :

अद्भुत चित्रकार :

पथिक ! तनिक ध्यान से देखो , चितेरे ने बना दीं अनगिनत रंग-बिरंगी तस्वीरें , कुछ को दे दी चटकीले रंगों की सौगात , प्रियतम से मिलकर चलती किसी अल्हड की तरह , कुछ को दे दिए उत्तेजना के लाल रंग , गगन में चमकती-गरजती विद्युल्लता की तरह , कुछ को सँवार दिया शांत से … Continue reading अद्भुत चित्रकार :

एकाकीपन :

जाने किसके शाप से शापित है ये जनजीवन , कुहासे में लुप्त हुए हैं कुटुम्ब और कुटुम्बीजन , अपने-अपने सुख हैं सबके अपने-अपने ग़म , देखता हूँ हर तरफ ये जीवन का एकाकीपन ! अपनी परिधि में होते मुदित यहाँ सभी के मन , ट्विटर , फेसबुक , वाट्सएप बना नया जीवन , रिश्ते-नाते कौन … Continue reading एकाकीपन :