बेज़ार ज़िंदगी :

मदहोश हवाओं ने जो उसके दर पर दस्तक दी , वो कतरों में जी रहा था उसने ख़ुदकुशी कर ली ! उनको कोई इल्म न था अपनी महसूफ़ियत में , उसकी साँसें बेज़ार थीं मुफ़लिसी की गर्दिश में ! वो बेइंतहा मशग़ूल थीं अपनी शौके-फ़ितरत में , उसकी ज़िन्दगी खौफ़जदा थी फ़ना के मंज़र में … Continue reading बेज़ार ज़िंदगी :

बेख़ुदी :

हमें ये इल्म है हमने ढेरों नसीहतें दी है , ख़ुद अमल करने का हौसला नहीं होता। हर रोज़  ग़ैरों  को आइना दिखाते हैं हम , ख़ुद से बात करने का हौसला नहीं होता। बेपनाह मंज़िलों की ख़्वाहिश लिए हैं हम , पर ख़ुद पे ऐतबार का हौसला नहीं होता ! वो बेपर्दा हो इसी … Continue reading बेख़ुदी :

हौसला :

उसे यक़ीन था ये क़ातिलों की  महफ़िल थी , कौनसी मुराद लिए वो फिर भी चला आया ! वो  वज़्म तो उसे गुनहग़ार  ही ठहरा रही थी , कौनसी आरज़ू लिए वो फिर भी चला आया। लोग तो  उसकी बर्बादी  का जश्न मना रहे थे , कौनसी मन्नतें लिए वो फिर भी चला आया। वो … Continue reading हौसला :

चिन्ता :

हे मन में उपजी चिन्ता ! तू भाग्य की दुष्ट-रेखा , तू मृग-मरीचिका की चल-रेखा , तू मरु-प्रदेश की जल-इच्छा , तू घिराव-फँसाव-भटकाव की जननी , तू निष्ठुरता की दीर्घ-लहरी , तू व्यथा तरंगों की धात्री , डस लेती जैसे हो सर्पिणी , तू मतवाली , तू कालजयी , तू तो नितांत स्वेच्छाचारी ! तू … Continue reading चिन्ता :

जीवन और जीवन्तता :

पथिक ! मलिनता छोड़ तनिक ग़ौर से सुनो , यदि स्वप्न नहीं हैं तो फिर संवेदनाएं नहीं हैं , यदि संवेदनाएं नहीं हैं तो जिजीविषा नहीं है , यदि जिजीविषा नहीं है तो जीवन्तता नहीं है , यदि जीवन्तता नहीं है तो जीवन ही नहीं है ! पथिक ! इसलिए स्वप्न देखो उत्कर्षण के , … Continue reading जीवन और जीवन्तता :

मिटती लकीरें :

वो अज़ीम शख़्स था उसे ख़ुद पर यक़ीन था , वो था तो समन्दर मगर दरिया सा रहता था , दुश्वारियों के सफ़ों पे वो ज़िन्दगी लिखता था , मंज़िलों की चाहतों से मगर वो बेपरवाह था ! सियहरात के धुँधलके उसके लिए फ़जूल थे , आँधियों के तेज थपेड़े भी उस पर बेअसर थे … Continue reading मिटती लकीरें :

कभी आओ तुम !

मेरा दरवाज़ा खुला है , कभी यूँ ही आओ तुम ! सुवासित वासन्ती हवाओं की तरह , गुलशन में महकते गुलों की तरह , उत्ताल-तरंगों की तान-धुन की तरह , वृष्टि को मचलते मेघों की तरह , मदमत्त रिमझिम बारिश की तरह , किसी किरणीली भोर की तरह , दीवार से आँगन में उतरती धूप … Continue reading कभी आओ तुम !

बंधन की उन्मुक्तता :

पथिक ! तनिक ध्यान से देखो , किसी नवयौवना जैसी अल्हड़ , थिरकती , मचलती , इठलाती , रंग-बिरंगे परिधानों से सुसज्जित , धागे के मनुहार पर नृत्य करती , उत्ताल तरंगों का निर्माण करती , मानो अनंत को छूने को आतुर , निश्छल उड़ान भरती पतंग को ! कितना अद्भुत आकर्षण है , इस … Continue reading बंधन की उन्मुक्तता :

फ़लसफ़े :

सिर्फ़ इस बिनाह पर कि तूफान का अन्देशा है , सब खिड़कियाँ बन्द कर लो ये भी कोई बात है ! उसे तो इम्तिहान लेने की शौक़े - फ़ितरत है, तुम नाउम्मीदगी में जियो ये भी कोई बात है ! ज़िंदगी कभी-कभी तन्हा भी गुजारी जाती है , ख़ुद को शराबों में डुबो दो ये … Continue reading फ़लसफ़े :

ख़्वाहिशें :

सबकुछ यहाँ अपनी करनी से ही पाया और खोया है , किसी पड़ाव पर यह सोचना भी कभी भला लगता है ! किससे क्या मिला किसने क्या दिया यह सोच आम है , किसको क्या दिया ये सोचना भी कभी भला लगता है ! उम्र तो उम्र है एक दिन मुक़म्मिल होना तो लाज़मी है … Continue reading ख़्वाहिशें :