नीरव-रात्रि-तिमिर को झुठलाती , ताराकिणी निशा के नीलवर्ण परिधान से , प्रेमातुर चाँद की रिसती धवल चाँदनी से , अपने कँपकँपाते अस्क को स्नान कराती , द्युतिमय रत्नों की अनुपम आभा बिखेरती , चहुँओर पर्वत श्रृंखलाओं से सुशोभित , खिलते हुए असंख्य प्रसूनों से सुसज्जित , कामिनी लताओं की मनभावन छटा संजोये , किसी दिव्य-लोक … Continue reading श्यामल झील
अँधेरा बोलता है
दूर तक दिखाई देता है , केवल और केवल अन्धकार , और उसका पहरा देते , नीम, पीपलऔर बरगद के वृक्ष , घनी काँटेदार झाड़ियाँ , और दुरूह पगडंडियाँ , कदाचित परिलक्षित होते हैं पर्याय , उन झोंपड़ियों में बसती जिंदगी के , जिनमें बस कहने को रहते हैं , चेहरे के रक्तहीन विचित्र शून्य … Continue reading अँधेरा बोलता है
हवाओं की परतें
दूर तक फैले अँधेरों की ही नहीं , बहती हवाओं की भी होती हैं परतें , जिन पर हर रोज़ लिखती है ज़िन्दगी , धमनियों में बहते लहू के कम्पन , अन्तस की धड़कन के मध्यम स्वर , आँखों में पलती आशाओं के उन्मीलन , स्वप्न खगों की उड़ान के मधुरिम गान , अपेक्षाओं के … Continue reading हवाओं की परतें
बरसता आसमान
रात्रि-तिमिर की नीरवता में , न जाने कौन-सी गहन वेदना के , तीव्र ध्वनि आवर्त सँजोता , दूर क्षितिज के उस छोर पर , बादलों को चीरकर आसमान बरसा ! देखता रहा स्वप्न-खगों पर सवार , अँधियारे को अनमना होकर उड़ान भरते हुए , ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओँ को पीछे छोड़ते हुए , गगनचुम्बी पर्वत श्रृंखलाओं को … Continue reading बरसता आसमान
एक अनजान चेहरा
एक अजनबी अनजान सा चेहरा , उभरता है अँधेरों की धमनियों को सहलाता , तिमिर के तिलिस्म को तोड़ता , जीवन-राग को छेड़ती किसी रागिनी सा , या फिर हवाओं की शीतलता को पिरोता , किसी विमन प्रतीक्षातुर धुँधलके को , द्युतिमय मुख पर सजती , कपोलों की अरुणिमा सी लालिमा से , और मृगनयनों … Continue reading एक अनजान चेहरा
एक नया सूरज
तनिक ध्यान से देखो पथिक ! दूर तक फैले सियहरात के , गहरे अंधकार की परतों में , जमे हुए कुहासे को चीरकर , न जाने कौन-सी जिजीविषा लिए , ठाने हुए किसी चट्टान-सा दृढ , एक अद्भुत और निराला संकल्प , अनेकों झंझावातों से जूझता , प्रतिरोधों की कंटकभरी डगर पर , अपनी पगडंडी … Continue reading एक नया सूरज
ख़्वाब
रात कुछ बैचेन थी और दर्द का सैलाब था , दूर तक फैला हुआ वो मंज़िलों का ख़्वाब था ! ज़िन्दगी अनजान थी और रास्ते थे अजनबी , रेत पर लिखी किसी इबारत का इम्तिहान था। बारिशें थीं तेज और उस नदी में भी उफ़ान था , और नाव खेने के लिए पतवार भी कुछ … Continue reading ख़्वाब
बेचैन चौराहा
विलुब्ध नेत्रों के स्फोटक आवेग से , देखता हूँ रात्रि-तिमिर को झुठलाते , नभ में टँगे हुए तारागणों की , मणियों -सी बिखरती चमक , और चन्द्रमा की निस्तेज -सी धवल चाँदनी को , चारों ओर क्रमबद्ध लैम्पपोस्टों की , दूधिया रोशनी से निस्तेज करते , कोलतार पथों से सुसज्जित , और बड़ी-बड़ी इमारतों के … Continue reading बेचैन चौराहा
अवचेतना में खोया शहर
घुमड़ते अवसाद भरे बादलों के साये में , क्षुब्धता से देखता हूँ यहीं कुछ दूर , गहन अवचेतना में खोया हुआ , एक संवेदनाहीन निष्प्राण सा शहर ! चहारदीवारों में कैद हलचल , अपनी ही धुन गुनगुनाती दीर्घ लहरियाँ , निज स्वार्थ की उत्ताल तरंगें , अपेक्षाओं की गठरी बाँधे , किसी नाट्यशाला की सी … Continue reading अवचेतना में खोया शहर