जीवन और जीवन्तता :

पथिक ! मलिनता छोड़ तनिक ग़ौर से सुनो , यदि स्वप्न नहीं हैं तो फिर संवेदनाएं नहीं हैं , यदि संवेदनाएं नहीं हैं तो जिजीविषा नहीं है , यदि जिजीविषा नहीं है तो जीवन्तता नहीं है , यदि जीवन्तता नहीं है तो जीवन ही नहीं है ! पथिक ! इसलिए स्वप्न देखो उत्कर्षण के , … Continue reading जीवन और जीवन्तता :

मिटती लकीरें :

वो अज़ीम शख़्स था उसे ख़ुद पर यक़ीन था , वो था तो समन्दर मगर दरिया सा रहता था , दुश्वारियों के सफ़ों पे वो ज़िन्दगी लिखता था , मंज़िलों की चाहतों से मगर वो बेपरवाह था ! सियहरात के धुँधलके उसके लिए फ़जूल थे , आँधियों के तेज थपेड़े भी उस पर बेअसर थे … Continue reading मिटती लकीरें :

कभी आओ तुम !

मेरा दरवाज़ा खुला है , कभी यूँ ही आओ तुम ! सुवासित वासन्ती हवाओं की तरह , गुलशन में महकते गुलों की तरह , उत्ताल-तरंगों की तान-धुन की तरह , वृष्टि को मचलते मेघों की तरह , मदमत्त रिमझिम बारिश की तरह , किसी किरणीली भोर की तरह , दीवार से आँगन में उतरती धूप … Continue reading कभी आओ तुम !

बंधन की उन्मुक्तता :

पथिक ! तनिक ध्यान से देखो , किसी नवयौवना जैसी अल्हड़ , थिरकती , मचलती , इठलाती , रंग-बिरंगे परिधानों से सुसज्जित , धागे के मनुहार पर नृत्य करती , उत्ताल तरंगों का निर्माण करती , मानो अनंत को छूने को आतुर , निश्छल उड़ान भरती पतंग को ! कितना अद्भुत आकर्षण है , इस … Continue reading बंधन की उन्मुक्तता :

फ़लसफ़े :

सिर्फ़ इस बिनाह पर कि तूफान का अन्देशा है , सब खिड़कियाँ बन्द कर लो ये भी कोई बात है ! उसे तो इम्तिहान लेने की शौक़े - फ़ितरत है, तुम नाउम्मीदगी में जियो ये भी कोई बात है ! ज़िंदगी कभी-कभी तन्हा भी गुजारी जाती है , ख़ुद को शराबों में डुबो दो ये … Continue reading फ़लसफ़े :

ख़्वाहिशें :

सबकुछ यहाँ अपनी करनी से ही पाया और खोया है , किसी पड़ाव पर यह सोचना भी कभी भला लगता है ! किससे क्या मिला किसने क्या दिया यह सोच आम है , किसको क्या दिया ये सोचना भी कभी भला लगता है ! उम्र तो उम्र है एक दिन मुक़म्मिल होना तो लाज़मी है … Continue reading ख़्वाहिशें :

बेचैन अँधियारा :

सियहरात का ये बेचैन अँधियारा , धुँधलके में घिरा हुआ , या किसी शापित अंधे कुएँ के , निष्प्राण तल से झाँकता हुआ , किसी लैम्पोस्ट की रोशनी से , जन्म लेती प्रभामणियों को , किसी मैले आँचल से ढँकता हुआ , दिनभर की उड़ान से थके हुए पक्षियों को , किसी वृक्ष की टहनियों … Continue reading बेचैन अँधियारा :

बदनसीबी :

आज वो फिर किसी फुटपाथ पे सोया है , सबके नसीब में घर की छत नहीं होती ! वो अपने घुटनों को मोड़ सिकुड़कर सोया है , सबके नसीब में ओढ़ने को चादर नहीं होती ! वो तो रातभर तन्हाई में करवट बदलता है , सबके नसीब में काँधे की सिहरन नहीं होती ! उसको … Continue reading बदनसीबी :

केवल देह नहीं हो तुम :

पथिक ! तनिक ध्यान से देखो , तुम्हारे अन्तस में पलते हैं , अगणित आशा-पुंज , उनकी तान-धुन पर तैरती , ज्योतिर्मय तीव्र लहरियाँ , उनसे संगत करते , जीवंतता के सशक्त स्वर , अनन्त को मुट्ठी में भर लेने का , अनुपमेय निश्छल आवेग , खग-पंखों पर उड़ान भरती , न जाने कितनी उम्मीदें … Continue reading केवल देह नहीं हो तुम :

यथार्थ से प्रश्न :

शाश्वत सत्य को अंगीकार करती , एक युगपुरुष की थकीहारी देह का , कालचक्र में हो गया अवसान , धधकती अग्नि की क्रूर लपटों ने , उसे कर दिया पंच-तत्वों में विलीन ! कालखण्ड बने दृश्य की साक्षी थीं , सैलाब सी उमड़ी अगणित आँखें , कुछ अश्रुपूर्ण तो कुछ बेचैन सी , कुछ स्तब्ध … Continue reading यथार्थ से प्रश्न :