कलयुग का अजेय रावण :

देश में धूम थी दशहरा-पर्व की , असंख्य रावण के पुतले , राजनेताओं के तीर खाकर , आग की भयंकर लपटों में , जल रहे थे धूँ-धूँ कर ! राजनेताओं की आढ़ में , सहमे से थे अभिनेता राम , लेकिन रावण कर रहा था , गगनभेदी क्रूर अट्टहास ! खुद ही सुना रहा था … Continue reading कलयुग का अजेय रावण :

प्रलयंकारी उत्सर्जन :

पथिक ! ज़रा ग़ौर से देखो , निःशब्द , निस्तेज किन्तु पाषाणी , विशाल चट्टानों को चीरकर , इनके अन्तस् की तरलता , नियति के निरंतर भयंकर दबाब , उपेक्षा के स्फोटक आवेग , और पर्त-दर-पर्त दबी हुई , प्रतिशोध की धधकती ज्वाला लिए , उस ज्वालामुखी के मुख से , लावा के रूप में … Continue reading प्रलयंकारी उत्सर्जन :

Inspection , Search & Seizure In GST Regime:  

Inspection , search and seizure have been inbuilt measures under fiscal law since its inception . It is a settled belief that no fiscal law can be effective without such enforcement measures . GST Regime has also incorporated this concept and has envisaged suitable measures and provisions regarding inspection , search and seizure in order … Continue reading Inspection , Search & Seizure In GST Regime:  

Detention , Seizure & Release Of Goods In GST Regime :            

Goods and Services Tax Regime lays significant emphasis on contravention of provisions envisaged in the related law while transporting or storing any goods when they are in transit and has provided strong measures to deal with such situation . Section 129 of the Central Goods And Services Tax Act , 2017 ( similar provisions are … Continue reading Detention , Seizure & Release Of Goods In GST Regime :            

हक़ीक़त :

उनकी महफ़िल में  सवेरा नहीं होता , अँधेरों में आदतन उजाला नहीं होता ! झूठ और  फ़रेब में अक्सर जीते-जीते , सच्चाई से जीने का हौसला नहीं होता। वतनपरस्ती में जीने को वो क्या जानें , वतनफ़रोशी से जिन्हें गुरेज़ नहीं होता। अपने ही आशियाने को जला देते हैं वो , वतन के लिए जिनमें … Continue reading हक़ीक़त :

प्रवाह :

मैं तो बस केवल प्रवाह , किसी दरिया का , किसी नहर का , किसी लघु सरिता का , किसी स्रोतस्विनी का , किसी जल-प्रपात का , किसी मचलती जल-धारा का , या लरजती-गरजती लहरों का ! मेरा जीवन ही जीवंतता , मेरा उद्दीपन ही जिजीविषा , मेरा आकर्षण ही निरंतरता , मेरा ध्येय ही … Continue reading प्रवाह :

मेघा रे :

मेघ ! कितने रूपों में तुम , बँटे  कितने  खानों में तुम , किसी प्रेमी का दूत बनकर , प्रेयसी का मनुहार बनकर ! सुकुमार की उमंग बनकर , बचपन की  मस्ती बनकर , यौवन का  प्रमाद  बनकर , मतवाले की उड़ान बनकर ! बिरहन की तपन बनकर , तड़प की  प्यास  बनकर , प्यास … Continue reading मेघा रे :

क़शिश :

ये  बादल यूँ  ही  मेरी  छत से गुज़र जाते हैं , गोया इन्होंने भी बेबफाई की क़सम खाई है ! जाने फिर भी क्यों आसमाँ को देखता हूँ मैं , कौनसे ज़ख्म ने उभरने की क़सम खाई है ! वक़्त तो तन्हाइयों में यूँ ही गुज़र जाता है , किस आरज़ू ने मचलने की क़सम … Continue reading क़शिश :