इस शहर का अंदाज़ कुछ अज़ीब हो गया है , ओहदे तो बढ़ गए हैं इंसान छोटा हो गया है ! यहाँ की हवाएं भी कभी बेवज़ह नहीं चलतीं , यहां रुतों का मिज़ाज भी मग़रूर हो गया है ! ख़ुदग़रज़ी तो यहाँ के हर शख़्स का हुनर है , मौक़ापरस्ती का चलन अब आम … Continue reading नए अंदाज़ का शहर :
प्रेमातुर पक्षी-युग्म :
दूर कहीं पर्वतीय अंचल में , किसी श्रावणी साँझ में , जब रुपहली चाँदनी धीरे-धीरे , समेटती है पर्वत शिलाओं को , अपने मधुरिम आगोश में , और लौटता है जीवन , अपने-अपने धरौंदों में , बहती हुई हवाओं के , मदमत्त झोंकों से अनजान , दिन-रात के झंझावात से दूर , किसी पर्वतीय नदी … Continue reading प्रेमातुर पक्षी-युग्म :
दोराहे पर भविष्य :
समय ले रहा है करवटें , जानता है सारे भेद , फिर भी अनजान बना , देख रहा है अनेक अभिनय ! जो सच है उससे क्या सरोकार , वो तो कहीं भी और कभी भी , बेबस है लुप्त हो जाने को , उसे तो न जाने कितने कुहासों की , तिलिस्मी परतों में … Continue reading दोराहे पर भविष्य :
General Provisions Regarding Determination of GST :
The determination of Tax has been a significant feature of every fiscal taxation structure but at the same time there are certain peripheries which have to be followed by the concerned authorities while making such determination . Sections 73 and 74 of the CGST Act , 2017 ( hereinafter referred … Continue reading General Provisions Regarding Determination of GST :
Determination Of Tax In GST Regime:
GST Regime very prominently exhibits the concept of self assessment and virtually accepts the return filed by any person on the basis of self assessment as the assessment order for that period under this innovative law . It also incorporates the concept of scrutiny of returns and assessment of non-filers … Continue reading Determination Of Tax In GST Regime:
गन्तव्य की ओर :
अपलक निरन्तर देखता हूँ , दूर किसी विशाल जलाशय में , गन्तव्य तलाशती कोई नाव , प्रश्रय के किनारों से दूर मझधार में , उफनती लहरों को जिजीविषा से भेदती , बीचियों को अपने प्रयास से काटती , कभी झंझावातों के भँवर से आशंकित हो , किसी माझी को तलाशती , कभी-कभी वेगयुक्त तीव्र झोकों … Continue reading गन्तव्य की ओर :
रहनुमा :
जाने कितने पैमानों से ज़हर पिया होगा , तब कहीं जाके वो मुक़द्दस बना होगा ! जाने कितने इम्तिहानों से गुज़रा होगा , तब कहीं जाके वो मुअल्लिफ़ बना होगा ! जाने कितनी रुसवाइयों से जूझा होगा , तब कहीं जाके वो मुअस्सिर बना होगा ! जाने कितनी ख़्वाहिशों को दफ़नाया होगा , तब कहीं … Continue reading रहनुमा :
आसमान सोया है :
हे चहुँओर पसरी मदमत्त चाँदनी ! इस कदर मत इठलाओ , अरी लरजती लहरो ! इतनी गर्जना मत करो , ओ कल-कल करती नदियो ! अपने छपाकों को शांत कर लो , हे निशा से अठखेलियाँ करते राकापति ! अपनी इस प्रणय-लीला को रोक लो , अरे अँधेरों को लजाते जुगनुओ ! कुछ देर कहीं … Continue reading आसमान सोया है :
नया आलोक :
अब वो माज़ी की सदाओं में नहीं जीता , उसने रुतों की तरह जीना सीख लिया है ! अब वो उन लाचारियों में नहीं रहता , उसने हालात से लड़ना सीख लिया है ! घने तिमिर के तिलिस्म से निकलकर , उसने उजालों में हँसना सीख लिया है ! माथे पे मढ़ी मलिन स्याही को … Continue reading नया आलोक :
विषमतायें :
ये बादल तो आवारा है ये भला क्या जाने , उस बदनसीब की छत से पानी टपकता है ! ये आँधियाँ तो बेख़ौफ हैं ये भला क्या जानें , उस झोंपड़ी का छप्पर अब भी कंपकपाता है ! ये आशियाँ तो मदहोश है ये भला क्या जाने , वहाँ दो जून की रोटी को बचपन … Continue reading विषमतायें :