नए अंदाज़ का शहर :

इस शहर का अंदाज़ कुछ अज़ीब हो गया है , ओहदे तो बढ़ गए हैं इंसान छोटा हो गया है ! यहाँ की हवाएं भी कभी बेवज़ह नहीं चलतीं , यहां रुतों का मिज़ाज भी मग़रूर हो गया है ! ख़ुदग़रज़ी तो यहाँ के हर शख़्स का हुनर है , मौक़ापरस्ती का चलन अब आम … Continue reading नए अंदाज़ का शहर :

प्रेमातुर पक्षी-युग्म :

दूर कहीं पर्वतीय अंचल में , किसी श्रावणी साँझ में , जब रुपहली चाँदनी धीरे-धीरे , समेटती है पर्वत शिलाओं को , अपने मधुरिम आगोश में , और लौटता है जीवन , अपने-अपने धरौंदों में , बहती हुई हवाओं के , मदमत्त झोंकों से अनजान , दिन-रात के झंझावात से दूर , किसी पर्वतीय नदी … Continue reading प्रेमातुर पक्षी-युग्म :

दोराहे पर भविष्य :

समय ले रहा है करवटें , जानता है सारे भेद , फिर भी अनजान बना , देख रहा है अनेक अभिनय ! जो सच है उससे क्या सरोकार , वो तो कहीं भी और कभी भी , बेबस है लुप्त हो जाने को , उसे तो न जाने कितने कुहासों की , तिलिस्मी परतों में … Continue reading दोराहे पर भविष्य :

गन्तव्य की ओर :

अपलक निरन्तर देखता हूँ , दूर किसी विशाल जलाशय में , गन्तव्य तलाशती कोई नाव , प्रश्रय के किनारों से दूर मझधार में , उफनती लहरों को जिजीविषा से भेदती , बीचियों को अपने प्रयास से काटती , कभी झंझावातों के भँवर से आशंकित हो , किसी माझी को तलाशती , कभी-कभी वेगयुक्त तीव्र झोकों … Continue reading गन्तव्य की ओर :

रहनुमा :

जाने कितने पैमानों से ज़हर पिया होगा , तब कहीं जाके वो मुक़द्दस बना होगा ! जाने कितने इम्तिहानों से गुज़रा होगा , तब कहीं जाके वो मुअल्लिफ़ बना होगा ! जाने कितनी रुसवाइयों से जूझा होगा , तब कहीं जाके वो मुअस्सिर बना होगा ! जाने कितनी ख़्वाहिशों को दफ़नाया होगा , तब कहीं … Continue reading रहनुमा :

आसमान सोया है :

हे चहुँओर पसरी मदमत्त चाँदनी ! इस कदर मत इठलाओ , अरी लरजती लहरो ! इतनी गर्जना मत करो , ओ कल-कल करती नदियो ! अपने छपाकों को शांत कर लो , हे निशा से अठखेलियाँ करते राकापति ! अपनी इस प्रणय-लीला को रोक लो , अरे अँधेरों को लजाते जुगनुओ ! कुछ देर कहीं … Continue reading आसमान सोया है :

नया आलोक :

अब वो माज़ी की सदाओं में नहीं जीता , उसने रुतों की तरह जीना सीख लिया है ! अब वो उन लाचारियों में नहीं रहता , उसने हालात से लड़ना सीख लिया है ! घने तिमिर के तिलिस्म से निकलकर , उसने उजालों में हँसना सीख लिया है ! माथे पे मढ़ी मलिन स्याही को … Continue reading नया आलोक :

विषमतायें :

ये बादल तो आवारा है ये भला क्या जाने , उस बदनसीब की छत से पानी टपकता है ! ये आँधियाँ तो बेख़ौफ हैं ये भला क्या जानें , उस झोंपड़ी का छप्पर अब भी कंपकपाता है ! ये आशियाँ तो मदहोश है ये भला क्या जाने , वहाँ दो जून की रोटी को बचपन … Continue reading विषमतायें :