विवश इतिहास :

इतिहास भी  विस्मयकारी होता , कभी  भविष्य की  नहीं  सोचता , न  कभी  वर्तमान को  विचारता , बस मूल्यांकन अतीत का करता ! गर्भ में  इसके  छिपे  कालखण्ड , जाने कितने प्रयाणों के मेरुदण्ड , प्रणेताओं की कालजयी गाथायें , उत्थान और पराभव की कथायें ! अंकित  है  इसके  अमिट पृष्ठों पर , वैश्विक संस्कृतियाँ … Continue reading विवश इतिहास :

स्वप्निल आकांक्षा :

जी चाहता है गुलशन में कलियों सा खिल जाऊँ , या यहीं कहीं फूलों की सुवास  बनके ठहर जाऊँ ! किसी पनघट पे सुकुमारता का मनुहार बन जाऊँ , या नवयौवन के सपनों का मधुर श्रृंगार बन जाऊँ ! सुरमयी अँखियों का कोई अल्हड़ सपना बन जाऊँ , या प्रेमातुर श्वासों का मनभावन संगीत बन … Continue reading स्वप्निल आकांक्षा :

वीरान हवेली :

जहाँ कभी रोशनी का परचम था , वहाँ धड़कनों में सुलगते हैं रूह के ग़म , अँधेरों के किरदार अक्सर खेलते हैं , रात के रूखे-सूखे पत्तों से , बेनूर हसरतें पहरा देती हैं , अश्कों के रिसते कतरों का , कुछ बासी लम्हे रुककर देखते हैं , जिस्मों के ईंधन में तपे रिश्तों को … Continue reading वीरान हवेली :

अश्कों की चादर में वक़्त :

आज फिर चाँद की पेशानी पे सिलवटें हैं , आज फिर लपटों में चाँदनी जली होगी , वक़्त किसी पेड़ के नीचे बैठा , अश्कों की चादर में सिमटा होगा , किसी तल-खोह-अँधेरे में अंधा कुआँ , अपनी बेबसी पर सिसक रहा होगा , रात पथराई आँखों में नमी तलाशती , गूँगी ख़ामोशियों से गुफ़्तगू … Continue reading अश्कों की चादर में वक़्त :

नया दौर :

कभी पगडंडी भी अक्सर हालेदिल पूछा  करती थी , अब तो ये सड़क  बेरुख़ी से  नज़र चुराती  रहती है ! कभी वो  कुआँ रोज़ पानी  के लिए बुलावा देता था , अब तो पानी की ख़ातिर ज़िद्दोजहद लगी रहती है ! कभी  बावड़ी और तालाबों का ख़ुशनुमा मंज़र था , अब पथरीली इमारतों में साँसों … Continue reading नया दौर :

वक़्त का सन्देश :

वक़्त किसी पेड़ की शाख पर , फड़फड़ाता है आर्त-स्वर में , किसी चोट खाये पंछी की तरह , समेटता है कुछ बासी से लम्हे , कुछ अनकही अनसुनी बातें , बुदबुदाता है हौले से , नीरवता के आँगन में तैरती , कुछ सिमटी हुई ख़ामोशियों से , चाहता है कुछ बताना , अपनी ही … Continue reading वक़्त का सन्देश :

झुलसता कैन्वस :

देखता हूँ अंधी-आकांक्षाओं की , घिनौनी एवं राक्षसी स्वार्थपूर्ति हेतु , चहुँओर तीक्ष्ण-घृणा की तपिश में , चिर हताशा से उबरने की कुचेष्टा के , कुटिल षड्यन्त्र से जलता परिदृश्य , झुलसाते हुए अनमने यौवन को , अपनी बेलगाम निरंकुश लपटों में ! रचता है दिक् भ्रमित से कैन्वस पर , विद्वेष और वैमनस्य की … Continue reading झुलसता कैन्वस :

एक विचार यह भी :

जीवन उतना लम्बा भी नहीं जितना हम उसे समझते हैं और यह उतना छोटा भी नहीं जितना उसे कभी-कभी हम बनाने की कोशिश करते हैं। इसलिए इसके हर पल को सजाना , संवारना और संजोना एक सहज आवश्यकता है। आश्चर्य है कि हम अपने जीवन में इस सत्य को कितना झुठलाते रहते हैं !

नूतन वर्ष में क्या लिखूँ ?

सोचता हूँ इस नूतन वर्ष में क्या लिखूँ ? देश की राजनीति का पराभव लिखूँ , या नेताओं की बढ़ती स्वेच्छाचारिता लिखूँ , अशिक्षित बुद्धिजीवियों की स्वार्थलिप्सा लिखूँ , या उनकी तिलिस्मी तिजारत की गाथा लिखूँ , अभिव्यक्ति की निरंकुशता लिखूँ , या भीतरघात करती ज़ुबाँ लिखूँ , बढ़ते जाते बलात्कार लिखूँ , या बाल-शोषण … Continue reading नूतन वर्ष में क्या लिखूँ ?