फ़ल्सफ़े :

जानने बूझने से  अब यहाँ  कुछ नहीं होता , आदमी ज़मीं की  तरह  बावफ़ा  नहीं होता ! चाहे  जितनी सावन  की बरसातें ले आओ , गर्म रेत पर बूँदों का कोई निशाँ नहीं होता ! व्यर्थ है बस्ती उजाड़ने वालों को समझाना , ज़िंदा  लाशों में सृजन का  माद्दा नहीं होता ! जो दिन-रात डूबे  … Continue reading फ़ल्सफ़े :

चुलबुली धूप :

धूप रोज़ आसमाँ से मेरे आँगन में उतर  आती है , जाने कितनी ख़्वाहिशों की इबारत लिख जाती है ! जाने क्यूँ उसने मुझे अपना मसीहा बना लिया है , मेरे दरो-दीवार पे उल्फ़त के निशाँ छोड़ जाती है ! रोज़  देखता हूँ  उसे पास  आते और दूर जाते हुए , वो चुलबुली सी फिर … Continue reading चुलबुली धूप :

आवारा बादल :

बादलों का क्या ये तो  बे-मौसम भी चले आते हैं , कभी बरसते हैं कभी बरसने का झाँसा दे जाते हैं ! इन्हें यक़ीं है कोई इनसे ज़िरह कभी नहीं करेगा , इसीलिए आँधियों के साये में बरबादी दे जाते हैं ! अपनी शौक़े-फ़ितरत में ये बेख़ौफ घूमते रहते हैं , अपने ज़ुल्मों-सितम से ये … Continue reading आवारा बादल :

अज़ीब दिलक़शी :

यूँ ही तन्हाई में हम दिल पे सितम करते हैं , तुझको लिखते हैं मगर  उसको मिटा देते हैं ! ये तो सच है कि ज़िन्दगी दूर चली आयी हैं , फिर  भी माज़ी को हम  अब भी सदा देते हैं ! वो  हवाएं तो अब  गुलशन में नहीं आती हैं , फिर  भी जज़्बातों … Continue reading अज़ीब दिलक़शी :

चेतना-शून्य आँधियाँ :

आँधियाँ अक्सर मदहोश होती हैं , उजाड़ देती हैं अनगिनत गुलशन , तोड़ देती हैं अनगिनत सपने , मिटा जाती हैं सृजन की लकीरें , बहा ले जाती हैं भविष्य की आशाएं , नहीं देखती झूठ और फ़रेब , नहीं जानतीं सत्य की सीमाएं , अनजान रहती हैं अंधी स्वार्थपरता से , बेख़बर रहती हैं … Continue reading चेतना-शून्य आँधियाँ :

वीरान हवेली :

जहाँ कभी रोशनी का परचम था , वहाँ धड़कनों में सुलगते हैं रूह के ग़म , अँधेरों के किरदार अक्सर खेलते हैं , रात के रूखे-सूखे पत्तों से , बेनूर हसरतें पहरा देती हैं , अश्कों के रिसते कतरों का , कुछ बासी लम्हे रुककर देखते हैं , जिस्मों के ईंधन में तपे रिश्तों को … Continue reading वीरान हवेली :

अश्कों की चादर में वक़्त :

आज फिर चाँद की पेशानी पे सिलवटें हैं , आज फिर लपटों में चाँदनी जली होगी , वक़्त किसी पेड़ के नीचे बैठा , अश्कों की चादर में सिमटा होगा , किसी तल-खोह-अँधेरे में अंधा कुआँ , अपनी बेबसी पर सिसक रहा होगा , रात पथराई आँखों में नमी तलाशती , गूँगी ख़ामोशियों से गुफ़्तगू … Continue reading अश्कों की चादर में वक़्त :

नया दौर :

कभी पगडंडी भी अक्सर हालेदिल पूछा करती थी , अब तो  ये सड़क  बेरुख़ी से नज़र चुराती रहती है ! कभी वो कुआँ रोज़  पानी के लिए बुलावा देता था , अब तो पानी की ख़ातिर ज़िद्दोजहद लगी रहती है ! कभी बावड़ी और तालाबों  का  ख़ुशनुमा मंज़र था , अब पथरीली इमारतों में  साँसों … Continue reading नया दौर :

वक़्त का सन्देश :

वक़्त किसी पेड़ की शाख पर , फड़फड़ाता है आर्त-स्वर में , किसी चोट खाये पंछी की तरह , समेटता है कुछ बासी से लम्हे , कुछ अनकही अनसुनी बातें , बुदबुदाता है हौले से , नीरवता के आँगन में तैरती , कुछ सिमटी हुई ख़ामोशियों से , चाहता है कुछ बताना , अपनी ही … Continue reading वक़्त का सन्देश :

अज़ीब क़ब्रिस्तान :

अज़ीब किस्म का क़ब्रिस्तान है ये , यहाँ दफ़्न हैं न जाने कितनी तारीख़ों के जिस्म , जिस्म अनगिनत बनी-बिगड़ी रियासतों के , अनगिनत शानो-शौक़त की दास्तानों के , अनगिनत बेबसी में लिपटी रुसवाइयों के , अनगिनत बार कुचली गयी इंसानियत के , और फिर सभ्यता के नाम पर , पुरानी सांस्कृतिक धरोहरों के विनाश … Continue reading अज़ीब क़ब्रिस्तान :