विलुलित नेत्रों से देखता हूँ ,
उस पार कराहते धुँधलके में ,
अंतिम संस्कार को तरसते ,
सड़क पर पड़े लाशों के ढेर ,
नई सभ्यता के अग्रगामी देश में ,
जहाँ रिश्तों की डोर बेदर्दी से तोड़कर ,
दुबक गयी है प्राणहीन आत्मीयता ,
बन्द दरवाज़ों के किसी सुरक्षित कोने में ,
अपना ही अस्तित्व बचाने की जुगत में !
फिर उदास-चित्त देखता हूँ ,
अजेय शक्ति का दम्भ भरते ,
अनगिनत अन्वेषणों की दुंदुभी बजाते ,
ज्ञान-विज्ञान के प्रणेता बनते ,
मानवता के विकास का पर्याय बनते ,
अपनी महानता का लोहा मनवाते ,
अति महत्वाकांक्षी विश्व के सिरमौर को ,
महाप्रलय की आहट से घबराकर ,
काल के समक्ष घुटनों के बल बैठे हुए !
मानो काल भी दे रहा हो सन्देश ,
भले ही मनुष्य करता हो उद्घोष ,
प्रकृति पर विजय पाने का ,
अनुसंधानों की नई इबारत लिखने का ,
सभ्यता के उत्तरोत्तर विकास का ,
चहुँओर समृद्धि और वैभव का ,
जीवन के अद्भुत संरक्षण का ,
प्रगति की अनुपमेय गाथा लिखने का ,
पर अभी भी है उसकी विवशता ,
काल-चक्र के नुकीले नेज़ों के सामने ,
उसके तूणीर में नहीं कोई अस्त्र ,
जिसे बना सके ढाल प्रलय के सामने !!

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