कुछ अर्सा को गया उस बस्ती को जले हुए ,
अब किसी भी घर में वहाँ धुँआ नहीं होता !
आँखों की नमी भी शायद सूख गयी है वहाँ ,
अब किसी दर पे मातम का शोर नहीं होता !
गुलशन जो ख़ुशनुमा था पल में उजड़ गया ,
उसे फिर से सँवारने का हौसला नहीं होता !
जो चन्द रोज़ मिज़ाज-पुर्सी के लिए आए थे ,
उन्हें वहाँ की मुसीबतों का ख़याल नहीं होता !
तन्हाई में किस क़दर मायूसी पसरी है वहाँ ,
अब किसी अख़बार में यह ज़िक्र नहीं होता !
दरिन्दे शौक़े-फ़ितरत में चमन उजाड़ देते हैं ,
कायनात के दर्द का उन्हें एहसास नहीं होता !

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