अज़ीब किस्म का क़ब्रिस्तान है ये ,
यहाँ दफ़्न हैं न जाने कितनी तारीख़ों के जिस्म ,
जिस्म अनगिनत बनी-बिगड़ी रियासतों के ,
अनगिनत शानो-शौक़त की दास्तानों के ,
अनगिनत बेबसी में लिपटी रुसवाइयों के ,
अनगिनत बार कुचली गयी इंसानियत के ,
और फिर सभ्यता के नाम पर ,
पुरानी सांस्कृतिक धरोहरों के विनाश के !
क़ब्रों में दफ़्न ये तारीखों के जिस्म ,
चाहकर भी नहीं ले सकते करवटें,
क्रूर नियति ने इनके भाल पर ,
लिख दी हैं कुछ अभेद्य पाषाणी लकीरें ,
और दफ़्न कर दिया है बड़ी बेदर्दी से ,
काल की गहराइयों में बनी इनकी क़ब्रों में !
यहाँ बसती हैं केवल वीरानियाँ ,
नीरवता की उदास तान-धुन ,
थरथराती अवचेतना की ध्वनि-तरंगें ,
कुछ जंगली जानवरों की आवाज़ें ,
कुछ श्वानों का अमंगलकारी रुदन ,
कुछ मनचले सियारों का झुंड ,
और कुछ दूर से गुज़रती पगडंडी पर ,
राहगीरों के मध्यम ध्वनि-आवर्त !
यदा-कदा कोई ले लेता है इनकी सुध ,
और ये भी बड़ी आशा से निहारते हैं उसको ,
देखने लगते हैं फिर से दिवास्वप्न ,
फिर स्याह अंधकार में इधर-उधर बिखरे ,
कुछ रूखे-सूखे पत्तों की फड़फड़ाहट से ,
पुकारने लगते हैं किसी मसीहा को ,
क़ब्रों में काल का कफ़न ओढ़े हुए !!

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