जी चाहता है गुलशन में कलियों सा खिल जाऊँ ,
या यहीं कहीं फूलों की सुवास  बनके ठहर जाऊँ !
किसी पनघट पे सुकुमारता का मनुहार बन जाऊँ ,
या नवयौवन के सपनों का मधुर श्रृंगार बन जाऊँ !
सुरमयी अँखियों का कोई अल्हड़ सपना बन जाऊँ ,
या प्रेमातुर श्वासों का मनभावन संगीत बन जाऊँ !
किसी दुलारे शिशु की मोहक किलकारी बन जाऊँ ,
या बचपन के खिलौनों का कोई अँगना बन जाऊँ !
किसी परिन्द की उड़ान का कोई आकाश बन जाऊँ ,
या किसी नदी के शीतल  जल का प्रवाह  बन जाऊँ !
सावन की फुहारों में सुर-लहरी बनके बिखर जाऊँ ,
या भीगी हवाओं में वासंती खुशबू सा महक जाऊँ !
सियहरात के अँधेरों  में जुगजुओं  जैसा  चमक जाऊँ ,
या तेजस्वी अरुणिमा का सुनहरी परिधान बन जाऊँ !
भोर में फुदकती  चिड़ियों की चहचहाहट  बन जाऊँ ,
या नटखट की निद्रा के लिए माँ की लोरी बन जाऊँ !
अक्सर जी चाहता है मेरा मैं  कुछ ऐसा  बन जाऊँ ,
कुछ मुझ में समा जाए या मैं किसी में समा जाऊँ !!

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