सोचता हूँ इस नूतन वर्ष में क्या लिखूँ ?
देश की राजनीति का पराभव लिखूँ ,
या नेताओं की बढ़ती स्वेच्छाचारिता लिखूँ ,
अशिक्षित बुद्धिजीवियों की स्वार्थलिप्सा लिखूँ ,
या उनकी तिलिस्मी तिजारत की गाथा लिखूँ ,
अभिव्यक्ति की निरंकुशता लिखूँ ,
या भीतरघात करती ज़ुबाँ लिखूँ ,
बढ़ते जाते बलात्कार लिखूँ ,
या बाल-शोषण के कुत्सित रूप लिखूँ !

नई सभ्यता की वेदी पर भस्म होते संस्कार लिखूँ ,
या बढ़ती जिस्म की नुमाइश लिखूँ ,
निरंतर अंधी दौड़ में साँस फुलाता यौवन लिखूँ ,
या येन-केन-प्रकारेण आगे निकलने की जुगत लिखूँ ,
साधना का तिरस्कार लिखूँ ,
या उच्छृंखलता का बढ़ता गुणगान लिखूँ ,
अपनी ही परिधि में सिकुड़ता समाज लिखूँ ,
या संबंधों के थोथले आवरण लिखूँ !

कहीं नैराश्य में मजबूर परिदृश्य लिखूँ ,
या मलिनता में अपनी धमनियाँ सुलगाती बेबसी लिखूँ ,
कहीं तन ढकने को लाचार अबला लिखूँ ,
या खिलौनों की आस खोता बचपन लिखूँ ,
कहीं दो जून की रोटी को संघर्षरत जीवन लिखूँ ,
या झूठे आश्वासनों की बरसात लिखूँ ,
उजालों में लगते ग्रहण लिखूँ ,
या सियहरात की नीरवता लिखूँ !

कुहासों-भरी वर्तमान की चादर में लिपटी ,
नूतन वर्ष की अलबेली अरुणिमा ,
उकेरती है मेरी उद्विग्न लेखनी के समक्ष ,
परत-दर-परत लिपटे अनगिनत प्रश्न ,
अनंत को बहुत गहराई से निहारता ,
यहीं किसी मोड़ पर हतप्रभ सा सोचता हूँ मैं ,
क्या नूतन प्रभात भी होगा निरुत्तर ,
या फिर देगा वर्तमान के यक्ष-प्रश्नों के उत्तर ?

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