देखता हूँ अंधी-आकांक्षाओं की ,
घिनौनी एवं राक्षसी स्वार्थपूर्ति हेतु ,
चहुँओर तीक्ष्ण-घृणा की तपिश में ,
चिर हताशा से उबरने की कुचेष्टा के ,
कुटिल षड्यन्त्र से जलता परिदृश्य ,
झुलसाते हुए अनमने यौवन को ,
अपनी बेलगाम निरंकुश लपटों में !

रचता है दिक् भ्रमित से कैन्वस पर ,
विद्वेष और वैमनस्य की तूलिका से ,
अभेद्य सी जान पड़ती पाषाणी लकीरें ,
मिटाता है निज तिजारत के वशीभूत ,
मृतप्राय मर्यादाओं की धुँधलाती तस्वीरें ,
करता है तार-तार नृशंस कुचेष्टा से ,
संवेदनाओं की मलिन होती जाती चादरें !

जब उठती हैं लपटें शहर के आँगन में ,
भटकता है राष्ट्रहित इधर-उधर बेबसी में ,
लगाता है गुहार जनहित थरथराहट में ,
न जाने कौनसे हितसाध्य की लालसा में ,
लक्ष्य से अनजान भटकता हुआ जीवन ,
भविष्य से होकर अनायास विस्मृत ,
मोहरा बन जाता है कुचक्रों की चौसर में !

ठगा सा यहीं किसी सहमें से मोड़ पर ,
मानवता के वक्षस्थल को विदीर्ण करते ,
कसकते-कराहते स्वरों की आहट में ,
विवश हो सोचता हूँ यूँ ही वितृष्णा में ,
कालखण्ड ने अपने भयावह चक्रवात से ,
जाने कैसा कुत्सित कुचक्र रच डाला ,
छीनकर चिरशांति प्रणेता का सर्वस्व ,
घृणित लपटों में इसे झुलसा डाला !!

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