उनकी महफ़िल में  सवेरा नहीं होता ,
अँधेरों में आदतन उजाला नहीं होता !

झूठ और  फ़रेब में अक्सर जीते-जीते ,
सच्चाई से जीने का हौसला नहीं होता।

वतनपरस्ती में जीने को वो क्या जानें ,
वतनफ़रोशी से जिन्हें गुरेज़ नहीं होता।

अपने ही आशियाने को जला देते हैं वो ,
वतन के लिए जिनमें जज़्बा नहीं होता।

जो नेकी के लिए जिद्दोजहद करता है ,
ऐसे खुददार को कोई खौफ़ नहीं होता।

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