ये  बादल यूँ  ही  मेरी  छत से गुज़र जाते हैं ,
गोया इन्होंने भी बेबफाई की क़सम खाई है !

जाने फिर भी क्यों आसमाँ को देखता हूँ मैं ,
कौनसे ज़ख्म ने उभरने की क़सम खाई है !

वक़्त तो तन्हाइयों में यूँ ही गुज़र जाता है ,
किस आरज़ू ने मचलने की क़सम खाई है !

रात तो बिरहन सी हर रोज़ यूँ ही भटकती है ,
माज़ी ने फिर करवटें लेने की क़सम खाई है !

ज़िन्दगी जाने क्यूँ फिर भी बुदबुदा जाती है ,
कौनसे लम्हों ने कसकने की क़सम खाई है !

One thought on “क़शिश :

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