जैसे ही पोर्ट ब्लेयर की सेल्युलर जेल से बाहर निकलते हैं तो दाहिनी ओर वीर सावरकर पार्क है। इसे रात्रि में देखना अत्यंत मनोहारी होता है। रात्रि में आकर्षक विद्युत -रोशनी में नहाया हुआ यह पार्क सहज ही अपनी ओर ध्यानाकर्षण करता है। यहाँ से नीचे पोर्ट ब्लेयर शहर की जगमगाती रोशनी तथा समुद्र के बैक वाटर का नयनाभिराम दृश्य पर्यटकों के लिए एक अनुमेय छटा का दिग्दर्शन कराता है। लेकिन यह पार्क भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले उन ६ शहीदों से हमारा परिचय कराता है जिन्होंने ब्रिटिश सरकार की नृशंस एवं पाशविक यातनाओं को सहते-सहते इस भयावह सेल्युलर जेल में अपने प्राणों का बलिदान देश की स्वतंत्रता के लिए कर दिया। इस पार्क में ६ शहीदों की प्रतिमाएं इनके संक्षिप्त परिचय सहित स्थापित हैं। देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले ये वो स्वतंत्रता सेनानी हैं जिनका कोई उल्लेख उस इतिहास में नहीं है जिसे आज स्वतन्त्र भारत की पाठशालाओं में विभिन्न पाठ्यक्रमों के माध्यम से इस देश की नवोदित पीढ़ी को पढ़ाया जाता है तथा जिनके नाम तक से आज की पीढ़ी तथा देश के अधिकांश नागरिक अनभिज्ञ हैं। ये महान स्वतंत्रता  सेनानी  हैं – (१) श्री मोहन मोइत्रा (२) श्री इन्दु भूषण रॉय (३) बाबा भान सिंह (४) पंडित राम रक्खा (५) श्री महावीर सिंह और (६) श्री मोहन किशोर नामदास।

श्री मोहन मोइत्रा के पूज्य पिता का नाम श्री हेमचन्द्र मोइत्रा था। यह नातुन , भारेंगा , पबना बंगाल के रहने वाले थे। रंगपुर समूह की युगांतर पार्टी के साथ इनका समन्वय था। २ फरवरी , १९३२ को कलकत्ता में इन्हें आर्म्स एक्ट केस के सिलसिले में गिरफ़्तार किया गया और काला पानी की सजा देकर अंडमान की सेल्युलर जेल भेज दिया गया। यहां इन्होंने अंग्रेजी सरकार द्वारा कैदियों के साथ हो रहे नृशंस और पाशविक व्यवहार के विरुद्ध आवाज उठाई तथा १९३३ की भूख हड़ताल में भाग लिया। २८ मई , १९३३ को यह महान क्रांतिकारी जेल कर्मियों द्वारा जबरदस्ती भोजन कराने की पाशविकता के चलते शहीद हो गया। यह कृतज्ञ राष्ट्र ऐसे महान देशभक्त का सदैव ऋणी रहेगा।

श्री इन्दु भूषण रॉय के पूज्य पिता का नाम श्री तारक नाथ रॉय था। ये खुलना , बंगाल के रहने वाले थे। इन्हें अलीपुर बम कांड में दस वर्ष की कठोर कारावास की सजा देकर अंग्रेजी सरकार ने अंडमान की सेल्युलर जेल के लिए निर्वासित कर दिया। महान क्रांतिकारी श्री इन्दु भूषण रॉय को सेल्युलर जेल में निरंतरता से इतनी पाशविक तथा बर्बरतापूर्ण यातनाएं दी गयीं कि ये शारीरिक तथा मानसिक रूप से पूरी तरह ध्वस्त हो गए फिर भी इनके होठों पर भारतमाता की जय और वन्दे मातरम् के स्वर थे। इनकी धमनियों ने इस निर्ममता से दी गयी यातनाओं के चलते इनका साथ छोड़ दिया और ये इसी सेल्युलर जेल में २९ अप्रैल , १९१२ को शहीद हो गए। ऐसे महान देशभक्त का यह कृतज्ञ राष्ट्र सदैव ऋणी रहेगा।

बाबा भान सिंह के पूज्य पिता का नाम श्री सारण सिंह था। ये पंजाब प्रांत के लुधियाना के रहने वाले थे। बचपन से ही इनके मन में स्वतंत्रता पाने की लौ प्रज्वलित हो गई थी। १९१५ के लाहौर षड़यंत्र कांड में इन्हें दोषी ठहराते हुए अंग्रेजी हुकूमत ने इन्हें आजीवन काला पानी की सजा दे दी। सेल्युलर जेल में इन्हें पाशविक तथा बर्बरतापूर्ण ढंग से पीटा गया लेकिन इस महान देशभक्त के होठों पर भारतमाता की जय तथा वन्दे मातरम् के स्वर तैरते रहे । असहनीय नृशंस यातनाओं के चलते यह महान क्रान्तिकारी स्वतंत्रता के सपने बुनते-बुनते १९१७ में शहीद हो गया। यह कृतज्ञ राष्ट्र इस महान देशभक्त का सदैव ऋणी रहेगा।

पंडित राम रक्खा पंडित जवाहिर राम के सुपुत्र थे। ये सदर , होशियारपुर , पंजाब के रहने वाले थे। पंजाब में तत्समय क्रान्ति की चिंगारी लौ बन चुकी थी। पंडित राम रक्खा भी इससे विलग कहाँ रह सकते थे। अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने को उद्यत इस क्रांतिकारी को माडले षड़यंत्र कांड में आजीवन कारावास की सजा देकर सेल्युलर जेल निर्वासित कर दिया गया। जब जेल अधिकारियों ने उनके जनेऊ धारण करने के अधिकार पर आपत्ति की तो इन्होंने इसका प्रतिवाद किया और भूख हड़ताल का आश्रय लिया। पंडित राम रक्खा पूरे तीन महीने तक भूख हड़ताल पर रहे और जेल की यातनाएं सहते रहे। अंततः भारतमाता का यह सपूत १९१९ में स्वतंत्रता के सपने सँजोते -सँजोते भूख हड़ताल की बलि होकर कीर्तिशेष हो गया। इस महान देशभक्त का यह कृतज्ञ राष्ट्र सदैव ऋणी रहेगा।

श्री महावीर सिंह कुंवर देवी सिंह के सुपुत्र थे। यह शाहपुर , एटा , उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे। ये हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता थे। देश के स्वतंत्रता आंदोलन में यह भी तन-मन से कूद पड़े। इन्हें १९२९ में लाहौर षड़यंत्र कांड में दोषी मानते हुए गिरफ़्तार किया गया तथा काला पानी की सजा देकर अंडमान की सेल्युलर जेल निर्वासित कर दिया गया। यहाँ जेल अधिकारियों के पाशविक तथा बर्बरतापूर्ण व्यवहार के विरुद्ध मई , १९३३ की भूख हड़ताल में इन्होंने भी भाग लिया। १७ मई , १९३३ को इनकी भूख हड़ताल को तोड़ने के उद्देश्य से बर्बरतापूर्ण ढंग से भोजन कराने की जेल कर्मियों की नृशंस प्रक्रिया में यह महान देशभक्त शहीद हो गया। यह कृतज्ञ राष्ट्र इनके यशस्वी बलिदान का ऋणी है।

श्री मोहन किशोर नामदास श्री राज गोविन्द नामदास के सुपुत्र थे। यह सरावर , बजीतपुर , मैमन सिंह , बंगाल के निवासी थे। ये अनुशीलन पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता थे। इन्हें नेत्रकोना सोआरीकांडा एक्शन काण्ड में ७ वर्ष की कठोर सजा देकर अंडमान की सेल्युलर जेल निर्वासित कर दिया गया था। इन्होंने ने भी यहाँ जेल अधिकारियों के पाशविक एवं बर्बरतापूर्ण व्यवहार के विरुद्ध मई , १९३३ में हुई भूख हड़ताल में भाग लिया। २६ मई , १९३३ को जेल कर्मियों द्वारा बर्बरतापूर्ण ढंग से जबरदस्ती भोजन खिलाने की नृशंस प्रक्रिया में यह महान देशभक्त कीर्तिशेष हो गया। यह कृतज्ञ राष्ट्र इनके यशस्वी बलिदान का ऋणी है।

वीर सावरकर पार्क में इन महान देशभक्तों के विषय में जानकार अपनी अल्पज्ञता का बोध कुछ अंश तक शांत हो सका। कितने महान थे ये क्रांतिकारी जिन्होंने इस देश की स्वतंत्रता के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। यह प्रश्न मेरे अन्तस् को निरंतर कचोटता है कि क्या हमने उनके इस महान बलिदान का स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यथेष्ट प्रदिदान दिया ?

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