शाश्वत सत्य को अंगीकार करती ,
एक युगपुरुष की थकीहारी देह का ,
कालचक्र में हो गया अवसान ,
धधकती अग्नि की क्रूर लपटों ने ,
उसे कर दिया पंच-तत्वों में विलीन !
कालखण्ड बने दृश्य की साक्षी थीं ,
सैलाब सी उमड़ी अगणित आँखें ,
कुछ अश्रुपूर्ण तो कुछ बेचैन सी ,
कुछ स्तब्ध तो कुछ डबडबी सी ,
कुछ नैराश्यपूर्ण तो कुछ ठगी सी ,
कुछ अर्थपूर्ण तो कुछ अनमनी सी ,
कुछ माज़ी की लकीरें कुरेदती सी ,
तो कुछ वर्त्तमान को कोसती सी ,
कुछ तल-खोह-अँधेरों में डूबी सी ,
तो कुछ भविष्य खँगालने को आतुर सी ,
कुछ किसी मनीषी सी विचारमग्न ,
तो कुछ व्यथारंजित हो शांत सी !

पर वो केवल देह नहीं थी ,
वो तो अपने में समाये हुए थी ,
काल के कपाल पर सृजन करते ,
एक “अटल ” अद्भुत व्यक्तित्व को ,
जो उससे मुक्त हो वहीं कहीं दूर ,
न जाने कितनी उद्विग्नता में ,
कर रहा था पाषाणी यथार्थ से,
कुछ अनचाहे किन्तु अर्थपूर्ण प्रश्न ,
कि यह उमड़ता जनसैलाब ,
मुझे अंगीकार या आत्मसात भी करेगा ,
या मैं भी बन जाऊंगा इस देह जैसा ही ,
किसी कालखण्ड का भूला-बिसरा ,
कहानियों में या उपन्यासों में ,
कविताओं में या उद्बोधनों में ,
या फिर मंज़िलों को टटोलती ,
निज-स्वार्थ में डूबी ख़्वाहिशों में ,
सुविधानुसार प्रयोग होता ,
केवल एक स्मृति-शेष अतीत !

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