पथिक ! तनिक ध्यान से देखो ,
किसी नवयौवना जैसी अल्हड़ ,
थिरकती , मचलती , इठलाती ,
रंग-बिरंगे परिधानों से सुसज्जित ,
धागे के मनुहार पर नृत्य करती ,
उत्ताल तरंगों का निर्माण करती ,
मानो अनंत को छूने को आतुर ,
निश्छल उड़ान भरती पतंग को !

कितना अद्भुत आकर्षण है ,
इस पतंग के गतिमान उत्कर्षण में ,
कितनी सहज उन्मुक्तता है ,
इसके धागे से बंधन की स्वीकार्यता में ,
एक ऐसा अनुपमेय बंधन ,
जो देता है निष्प्राण से दिखते ,
कदाचित जड़त्व का बोध कराते ,
मनुहार करते धागे और प्रेमातुर पतंग को ,
उड़ान भरी जीवंतता के नूतन स्वर !

पथिक ! एक सत्य यह भी जान लो ,
पतंग का यह दिगंत-व्यापी आवेग ,
तभी तक करता है जीवंतता का उद्घोष ,
जब तक रहता है उसका धागे से ,
निश्छल एवं मौन बंधन अक्षुण्ण !
जैसे ही टूटता है यह बंधन ,
धागा और पतंग दोनों ही ,
अधोगति पाकर हो जाते हैं निष्प्राण !
मानो देना चाहते हों सन्देश ,
यह उन्मुक्तता भरी जीवंतता ,
न तो पतंग में है और न धागे में ,
यह तो है निश्छल मौन बंधन में !

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