पथिक ! अपना द्रष्टव्य स्थिर करके ,
फेन उगलती , लरजती , गरजती ,
सागर की मदमत्त लहरों को देखो !
जो न जाने किस स्पृहा के वशीभूत ,
अनन्त काल से करती हैं किनारों पर ,
निर्ममता से भीषण प्रहार !
पर नहीं छोड़ता किनारा अपनी मर्यादा ,
नहीं ग्रसित होता किसी वैमनस्य से ,
नहीं उद्यत होता लेने को प्रतिशोध ,
इन उच्छृंखल लहरों से !
रहता है शांत और अविचलित ,
सहते हुए अपने वक्षस्थल पर ,
इन अभिमानी लहरों के ,
तीक्ष्ण और निष्ठुर प्रहार !
जानता है यह जीवन-सत्य ,
झंझावातों और विषमताओं में ,
स्थिर और शांत रहना ही है ,
स्थित-प्रज्ञ का परम लक्ष्य !

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