जब धमनियों में लहू लहरों सा लरजने लगे ,
जब उमंगें उत्ताल तरंगों सी मचलने लगें ,
जब साँसें बेख़ौफ़ आँधियों सी बहकने लगें ,
जब धड़कनें किसी तान-धुन पर थिरकने लगे ,
जब खग-स्वप्न अपने अनंत को छूने लगें,
जब जन्मों की प्यास समंदर में समाने लगे,
न अँधेरों का ख़ौफ हो, न उजालों की फ़िक्र,
तब शब्द अक्सर निःशब्द से हो जाते हैं !!

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