कल वो सोया तो बहुत देर तक सोता रहा ,
ओढ़कर बिखरे ख़्वाबों की मटमैली चादर !
अब उसे यक़ीन हुआ कि वो थक गया था,
जीवन के प्रवंचनामयी छलावों में दौड़कर !

उस बड़े से मकान के एक तन्हा कमरे में ,
नींद में भी वो जाने क्यों छटपटाता रहा !
न जाने कौन से प्रश्न थे जो अनुत्तरित थे ,
सिली पलकों में भी जिनसे वो जूझता रहा !

उस रोज़ ज़िन्दगी उसकी नींद सी तन्हा थी,
रिश्तों के सैलाब में वो नितान्त अकेला था !
अपेक्षाओं की गठरी वो पीछे छोड़ आया था ,
उपेक्षाओं के भँवर में वो निढाल हो गया था !

सोचता हूँ ज़िन्दगी कैसी पहेली बन जाती है,
एक से अनेक और फिर अकेला कर जाती है !
कितने सपने सजते -सँवरते और बिखरते हैं ,
फिर अचानक एक गहरी नींद आ जाती है !

One thought on “कचोटता यथार्थ :

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