सुबह उठते ही देखता हूँ ,
सफेद धुँधलके में ख़ुद को छिपाता ,
किसी नीरवता में साँस लेता ,
ठिठुरता , सिकुड़ता ,सिहरता ,
ख़ुद को ख़ुद में ही कहीं ढूँढ़ता ,
उनींदा सा , कुछ खोया-खोया सा ,
कुछ अज़ीब सा द्वंद्व करता ,
अनमना सा ये शहर !

फिर पास ही बामुश्किल देखता हूँ ,
किसी चाय की दुकान पर ,
कुछ ठिठुरते लोगों को ,
चाय की चुस्की लेते बतियाते हुए ,
कुरेदते हुए कोई इतिहास ,
गढ़ते हुए कोई निरर्थक सा वृत्तांत ,
बुनते हुए कोई स्वप्निल सी अपेक्षाएं ,
चाय की अंतिम चुस्की के साथ ही ,
थमता हुआ मानसिक उद्रेक !

फिर देखता हूँ इस धुँधलके को चीरती ,
कुछ स्कूल की बसें , कुछ कारें , कुछ रिक्शे ,
बेबसी में अपना गंतव्य तलाशते हुए ,
कुछ माताओं को अपने बच्चों का हाथ थामे ,
स्कूल की ओर जाते हुए ,
कुछ स्फूर्ति से सराबोर बच्चों को ,
साइकिल पर अपनी राह ढूँढ़ते हुए ,
और कुछ ठिठुरते राहगीरों को ,
मानो इस धुँधलके को झुठलाते हुए !

फिर देखता हूँ दृष्टव्य को चुनौती देते ,
कुछ दूरी पर जलते अलाव ,
उनके पास हाथ तापते चन्द लोग ,
रोज़ की तरह अख़बार बाँटते ,
घर-घर दूध बाँटते ,
सब्ज़ी और फलों के ठेलों को ढोते ,
इस धुँधलके से बेपरवाह ,
कुछ ऐसी ही बेबसी से जूझते ,
जीविकोपार्जन में लगे लोग !
यहीं इसी मोड़ के किनारे ,
अनमना सा मैं देखता हूँ ,
न जाने कितने प्रश्न करता ,
किसी तिलिस्मी धुँधलके में डूबा ये शहर !

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