देखता हूँ अनमना सा अपने समीप ही ,
सोमवार आते ही कोलतार-पथ बुनती ,
उत्तराधुनिक सभ्यता में साँस लेती ,
ये दूर तक जाती चौड़ी-चौड़ी सड़कें ,
सप्ताहांत के रविवार को सुसियाने के बाद ,
भोर की पहली किरण के साथ ही ,
जो फिर से हो जाती हैं मानो जीवन्त ,
और इनकी जिजीविषा को तोलती ,
इन पर अनायास दौड़ने लगती हैं ,
तेज-तर्रार बाइक , ऑटो , कारें , स्कूल-बसें ,
कुछ इठलाती स्कूटियाँ और उद्विग्नताएँ !

सबकुछ मुझे जैसे बहुत पीछे छोड़ जाता है ,
और सबसे आगे निकलने की जुगत में ,
इन तेज चलते वाहनों का उपक्रम ,
मानो हो जाता है अपने आवेग में उद्यत ,
लिखने को ज़िन्दगी की नई परिभाषाएं !
सबकुछ जैसे नियति-बद्ध सा ,
सबकुछ जैसे स्व-चालित सा ,
किसी निश्चित तान-धुन पर
जानी-पहचानी तरंगों को बुनते हुए !

देखता हूँ अलसाये छोटे-छोटे बच्चों का ,
रविवार की छुट्टी के बाद स्कूल जाने का प्रयाण ,
वो उनकी माताओं का उन्हें स्कूल छोड़ने आना ,
वो समय से लंच खा लेना का मनुहार करना ,
वो कुछ पिताओं का भी पितृ-धर्म निभाना ,
वो फिर से आफिस जाने की तैयारी ,
वो कुछ भूल जाने पर होती झुँझलाहट ,
वो आधा अधूरा सा ब्रेकफास्ट खाकर ,
जल्दी से जाने का चिर-परिचित अंदाज़ ,
न जाने कितनी चिंतायें और तनावों को साथ लिए ,
फिर से बुनने लगाती हैं कितनी ही गाथाएं !

नहीं देखता हूँ तो अपने माज़ी को तलाशते ,
जीवंतता को ढूँढते उन वृद्धों को ,
जो हर रविवार को किसी छड़ी के सहारे ,
इन अलसाई सड़कों पर दिखते हैं प्रयासरत ,
कदाचित प्राण-वायु को अपने अंदर समेटने को ,
जिनके लिए एक दिन को ही सही ,
कुछ शांत से दिखते हैं ये कोलतार पथ !
लगता है जैसे कुछ थम सा जाता है ,
इनकी बेमानी ज़िन्दगी की तरह !
और सोमवार आते ही ले जाता है ,
इनसे इनके ये जीवंतता ढूँढ़ते पल ,
एक सप्ताह की प्रतीक्षा का वादा देकर !
ठगा सा मैं देखता रह जाता हूँ समय का ,
ये मन को कचोटता किन्तु निर्णायक उपक्रम !

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