हवाओं ने अपना रुख़ बदल लिया है ,
उसके दरवाजे अब वो दस्तक नहीं सुनते ,
जिसकी आदत थी उन्हें सुनने की ,
वो रंजोग़म की स्याही भी न रही ,
जो रोज़ लिखती थी सफ़ों पर ,
चाही-अनचाही न जाने कितनी बातें ,
न जाने कहाँ गयीं वो बेचैनियाँ ,
और वो दिन-रात की दौड़भाग ,
जो कभी होती थीं अनायास ही ,
अनगिनत उलझनों का सबब !
स्वप्न-खगों ने मानो लिख दी हो ,
उसके वितृष्णा भरे अवचेतन मन पर ,
यथार्थ की कठोरता की सम्पूर्ण गाथा !

बेज़ार सा हो चला है उसका घर ,
वही उदास धुन गुनगुनाते हुए ,
अँधेरों में बस कभी-कभार उभरती है ,
लुका-छिपी करती कुछ उत्ताल तरंगें !
वक़्त भी करता है मानो अटखेलियाँ ,
सामने दीवार के कैन्वस पर ,
धुँधलाते शब्द-चित्र बनाते हुए ,
कुछ ऐसे सायों में क़ैद ज़िंदगी के ,
जिनको तलाशना होता है मुश्किल ,
सियहरात के किसी कुहासे की तरह !
मानो वो अभी से बन गया है ,
किसी काल-खण्ड का खोया अतीत ,
कहीं ज़िक्र होता है तो लोग कहते हैं ,
वो एक अज़ीम शख़्स था ,
वो एक अच्छा , बहुत अच्छा इंसान था !

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