पथिक ! न जाने किसका शाप ढोती है ,
रेगिस्तान की वीरानियों में पलती रेत !
जिसकी नियति है तपना और तड़पना ,
जन्मों की प्यास अन्तस् में दबाये रखना ,
अपनी तन्हाई में ख़ुद ही जलते रहना ,
कभी किसी से अपनी व्यथा न कहना ,
तेज आँधियों के भीषण प्रहार सहना ,
चक्रवातों में अपने अस्तित्व से जूझना ,
ये तो रहती है किसी निराश्रिता की तरह ,
दर-दर भटकती किसी भिखारन की तरह !

इसका कोई गाँव , देश या वतन नहीं होता ,
इसका विस्तार किसी को आश्रय नहीं देता ,
किसी थके-हारे की क्षुधा या प्यास नहीं मिटाता ,
इसकी सुध भी कोई राहगीर नहीं लेता ,
ऊँटों की पदचाप देती है इसे क्षणिक जीवन्तता ,
तोड़ती है इसकी चिर-एकाकीपन की तंद्रा ,
दे जाती है इसके जीवन को भी कोई उपादेयता ,
किसी दिवास्वप्न जैसी प्रवंचनाओं की मधुरता ,
न जाने कौनसी जिजीविषा लिए युग-युगान्तरों से ,
फिर भी संघर्षरत रहती है यह अभिशप्त रेत !

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