पथिक ! तनिक ध्यान से देखो ,
चितेरे ने बना दीं अनगिनत रंग-बिरंगी तस्वीरें ,
कुछ को दे दी चटकीले रंगों की सौगात ,
प्रियतम से मिलकर चलती किसी अल्हड की तरह ,
कुछ को दे दिए उत्तेजना के लाल रंग ,
गगन में चमकती-गरजती विद्युल्लता की तरह ,
कुछ को सँवार दिया शांत से दिखते माध्यम रंगों से ,
शीतलता देते किसी मलय-समीर की तरह ,
कुछ को दे दिया नीरवता के रंगों का उपहार ,
सियहरात में किसी नदी के मध्य भटकती अकेली नाव की तरह ,
कुछ में तो खींच दी केवल काली रेखाएं ,
किसी उदास-ताल-धुन की तरंगों की तरह !

पथिक ! एक ध्रुव सत्य यह भी जान लो ,
उस अद्भुत चितेरे ने जानबूझकर छोड़ दिए ,
जिजीविषा और कठोर श्रम की तूलिका को थामकर ,
भरे गए रंगों में परिवर्तन करने के अनेक विकल्प ,
इसलिए इन रंगों से मिली मलिनता को भूलकर ,
करो एक प्रयास इन रंगों के परिवर्तन का ,
कि जीवन में किया गया कठोर प्रयास ही सर्वस्व है ,
कि अपनी तूलिका से खुद अपने रंग भरने का नाम ही जीवंतता है ,
मत सोचो कि आज जो तुम देखते हो वो रंग मटमैले हैं ,
मत सोचो कि इनमें केवल काली रेखाएं ही अंकित हैं ,
अपनी तूलिका उठाओ और अपने प्रयत्न की कर्मभूमि पर ,
चाहे जैसी सार्थकता की मनोरमता के रंग भर दो !

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