बांगा , लायलपुर की उस घनी बस्ती के ,
बेनूर से होते जाते पुराने मकान से ,
आज भी एक आवाज़ प्रतिध्वनित होती है ,
जो बारम्बार पुकारती है ,
धमनियों में बहते लहू को ,
गूँजती है अन्तस् की गहराइयों में ,
झकझोरती है मानवीय संवेदनाओं को ,
पूछती है न जाने कितने प्रश्न ,
निष्ठुर होते जाते उन बेपरवाह क्षत्रपों से ,
जिनके रजवाड़े अभी भी जीवित हैं ,
किसी अंधी उड़ान में जीते तानाशाहों की तरह ,
और देती हो मानो चेतावनी ,
नागफनी बोने से गुलाब नहीं महका करते ,
त्याग की वेदी को स्वार्थ से भस्म करके ,
कभी तपोवन नहीं बना करते ,
मानो करना चाहती हो उद्घोष ,
जो मरता है वह तो केवल शरीर है ,
विचार कभी मरा नहीं करते ,
सुनता हूँ इसी कारण दिग-दिगंत में ,
चहुँओर होता यह चतुर्दिश निनाद ,
भगत सिंह अभी मरा नहीं !
भगत सिंह मरा नहीं करते !!

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