देखता हूँ चहुँओर बिखरे हुए असंख्य स्वप्न ,
कुछ मुर्झाए हुए , कुछ बेचैनियों में डूबे हुए ,
कुछ तड़पते हुए , कुछ यूँ ही झकझोरते हुए ,
कुछ अलसाये हुए , कुछ उनींदा से लगते हुए ,
कुछ बेकसी में कसकते हुए , कुछ बिलखते हुए ,
कुछ समय की त्रासदी पर अपनी परतें खँगालते हुए ,
कुछ सियहरात के अंधकार में डूबते हुए ,
और कुछ किसी तल-खोह-अँधेरे से झाँकते हुए !

फिर देखता हूँ कुछ अजीब से स्वप्न ,
कुछ इतराते हुए तो कुछ बलखाते हुए ,
कुछ न जाने कितने परिधानों में सजते-सँवरते हुए ,
कुछ इठलाते हुए किसी अनंत में उड़ान भरते हुए ,
कुछ किसी मिलन की आस को पंख लगाते हुए ,
कुछ नेत्रों के निमीलन में होठों के कम्पन सँजोते हुए ,
कुछ मिलन के पलों में दिग-दिगंत छूते हुए ,
और नई उमंग से सृजन की लालिमा को चूमते हुए !

कभी-कभी उद्विग्नता में आवेग भरी दृष्टि से देखता हूँ ,
मनुष्य को खग-स्वप्नों की उड़ान भरते हुए ,
दिवा-स्वप्नों की असीमित परिधि में विचरते हुए ,
झूठे से जान पड़ते स्वप्नों की दुंदुभी बजाते हुए !
अनमना सा सोचता हूँ कैसे-कैसे हैं ये इंद्रधनुषी स्वप्न ,
मानो किसी अपरिमेय परिधि में अपनी गाथा लिखते ,
जीवन की असंख्य अनुभूतियों को सराबोर करते ,
अपनी नियति भी स्वयं निर्धारित करते कालजयी स्वप्न !

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