विलुलित नेत्रों से देखता हूँ एक बेज़ार सा शहर ,
इसकी दूर तक जाती घुमावदार कोलतार सड़कें ,
बड़े-बड़े चौराहे और उनके इर्द-गिर्द दौड़ती ढेरों गाड़ियाँ ,
आलीशान बाज़ारों की चकाचौंध और मॉल की रंगीनियाँ ,
बार में रंगत बिखेरती नए मिज़ाज की रानाइयाँ ,
अलसाई सुबह और सजती-सँवरती रात की बेबाकियाँ ,
बहुमंजिली इमारतों में साँस लेती ज़िंदगी की रुसवाइयाँ ,
सम्बन्धों को अपेक्षाओं से सँवरते खग-स्वप्नों की कहानियाँ !

वहीँ कहीं ठेलों पर सामान और अपने सपने बेचते लोग ,
नियति ने जिनके भाल पर लिखी हैं बेबसी की लकीरें ,
कहीं-कहीं दो जून की  रोटी को भी तरसता बचपन ,
और कहीं क्रूरता की हदों से सहमता यौवन ,
न जाने कितनी वेदनाएं पलती हैं इसके आँगन में ,
न जाने कितनी संघर्ष रेखाएं सृजित होती हैं इसके दामन में ,
रोज़ न जाने कितनी दुश्वारियाँ यहाँ सजती हैं ,
यहां न जाने कब ज़िन्दगी पीछे छूट जाती है !

न जाने किस चितेरे ने इसमें इंद्रधनुषी रंग सँजोए हैं ,
फिर भी अपने ही धुँधलकों में घिरा ये शहर ,
न जाने कितने कुहासों में घिरा दिखता है ,
अज़ीब है अनेक प्रवंचनाओं में घिरा ये शहर ,
जिसकों बरसों से करीब से देखता आया हूँ ,
जिसकी धड़कन को भी कभी-कभी महसूस किया है मैंने ,
फिर भी अपने अन्तर्द्वन्द्वों की पटकथा ख़ुद ही लिखता ,
ये शहर न जाने क्यों अजनबी सा लगता है !

 

 

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