वो आज भी भेदता है मेरे दामन को ,
किसी तंज़ -भरे नुकीले नेज़े की तरह !
और कसकता है दिल की गहराइयों में ,
चुभ कर टूटे हुए किसी काँटे की तरह !!

वो धड़कता है साँसों में बहुत हौले से ,
दूर से आती बोझिल हवाओं की तरह !
और दहकता है बेज़ार से बुझे सीने में ,
फैलती प्रलयंकारी बडवाग्नि की तरह !!

वो कचोटता है बेजान सी धड़कनों को ,
किसी टूटे हुए अधूरे ख़्वाब की तरह !
और कभी सिहरता है इन धमनियों में ,
तल-खोह अँधेरों के आवर्त की तरह !!

वो आज भी भेदता है मेरे दामन को ,
किसी तंज़ -भरे नुकीले नेज़े की तरह !

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