तनिक ध्यान से देखो पथिक !
दूर तक फैले सियहरात के ,
गहरे अंधकार की परतों में ,
जमे हुए कुहासे को चीरकर ,
न जाने कौन-सी जिजीविषा लिए ,
ठाने हुए किसी चट्टान-सा दृढ ,
एक अद्भुत और निराला संकल्प ,
अनेकों झंझावातों से जूझता ,
प्रतिरोधों की कंटकभरी डगर पर ,
अपनी पगडंडी ख़ुद बुनता ,
वो देखो चला है एक सूरज ,
सदियों की अभिशप्तता को मिटाने ,
मलिनता में डूबी ज़िन्दगी को ,
और कहीं गहरी सोई हुई आत्मा को ,
अपने निष्कलंक और निस्वार्थ ,
प्रकाशपुंज से देदीप्यमान करने !
उठो पथिक ! अब देर न करो ,
देखो दस्तक दे रहा है एक नया सवेरा ,
नई आशाओं का , नए स्वप्नों का ,
अपनी बेमानी तंद्रा त्याग दो ,
इस नए आलोक को अपने ,
तेजोमयी सहकार से अमरत्व दे दो !!

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