दूर तक दिखाई देता है ,
केवल और केवल अन्धकार ,
और उसका पहरा देते ,
नीम, पीपलऔर बरगद के वृक्ष ,
घनी काँटेदार झाड़ियाँ ,
और दुरूह पगडंडियाँ ,
कदाचित परिलक्षित होते हैं पर्याय ,
उन झोंपड़ियों में बसती जिंदगी के ,
जिनमें बस कहने को रहते हैं ,
चेहरे के रक्तहीन विचित्र शून्य !

छलनामयी चाँदनी भी निस्तब्धता में ,
जैसे फांदकर चली जाती हो ,
इन झोंपड़ियों की मलिन बस्ती ,
जिनमें मन्द होती जाती ,
लालटेन की रोशनी ,
बरबस सुला देती है ,
सुलगती हुई आर्त-वेदना को ,
मुँह फाड़े किसी अंधे कुएँ की तरह ,
जिसका केवल वर्तमान है ,
न कोई भूत की थाती है ,
और ना कोई पल्लवित भविष्य ,
सूखी हुई टहनियों सी ,
साँस लेती है अर्थहीन दिशाहीन ,
वितृष्णा भरी विरक्त जिंदगी !

ठगा सा देखता हूँ अपलक ,
किसी विकासपुंज का पर्याय बनकर ,
बरबस खोलकर जंग लगी ,
ह्रदय पर लगी हुई कोई चिटखनी ,
जिसमें कैद रक्त-वर्ण ललाट ,
और सुशोभित भव्य आजानुभुज ,
किसी रागिनी का पर्याय बनकर ,
चहकता है , महकता है , बिहँसता है ,
इन मलिन बस्तियों से कोसों दूर ,
नितान्त अनजान सा ,
इनमें साँस लेते बेमानी जीवन से !

फिर सुनता हूँ पानी के छपाकों की आवाज ,
या फिर सियारों का अभेद्य स्वर ,
किसी बावड़ी या तालाब के किनारे ,
सोते हुए कुछ पक्षियों की छटपटाहट ,
साँय -साँय करके चलती सर्द हवा ,
नीरवता में जैसे करते हों ,
निस्तेज अँधेरे से वार्तालाप ,
साफ-साफ सुनता हूँ अँधेरे का ,
इनसे बुदबुदाना और सुनाना ,
सदियों से अपरिवर्तित ,
वही नैराश्य – गान ,
जिसके न सुर बदले न स्वर ,
आज भी लगता है जैसे ,
व्यथित सा अन्धेरा बोलता है !
अपनी गाथा स्वयं कहता है !

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